जाति ही पूछौ साधु…

आशीष बाजपेयी

वरिष्ठ पत्रकार- आशीष वाजपेयी

शेक्सपीयर ने कहा कि नाम में क्या रखा है। उनकी इस बात का हवाला आज तक दिया जाता है। तब उनकी बात किसी को समझ न आई थी, लेकिन मौजूदा दौर ने इस गूढ़ रहस्य को समझा और अब इस पर खूब अमल हो रहा है। नाम की कोई अहमियत ही न रह गई। मोबाइल नंबर, पैन नंबर, आधार नंबर, ओटीपी इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि अधिकतर को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका नाम क्या है। हर काम का एक नंबर। यह नंबर है तो घर बैठे काम हो जाएगा। वरना, नाम बताते घूमते रहिए। कोई खैरियत भी न पूछेगा।

इधर, महाराष्ट्र में एक महाशय शेक्सपियर से भी ज्यादा बड़े वाले निकल आये। प्रधानमंत्री को खत लिख मारा। कहाकि आपके संसदीय क्षेत्र के ही एक फकीर बाबा कबीर दास कह गए हैं- जाति न पूछो साधु की। और लोग अपनी जातियां बाइकों-कारों में गुदवाकर खुलेआम घूम रहे हैं। बस फिर क्या था, यह पत्र पीएमओ से नत्थी कर देशभर के परिवहन महकमों को भेज दिया गया। अब परिवहन और पुलिस महकमा ऐसे लोगों को खोज रहा है जो अपनी जाति लिखकर सार्वजनिक कर रहे हैं। आर्थिक दंड भी लगा रहा है।

शेक्सपियर वाली बात तो समझ आती है। चलो, एक साल्यूशन दिया। नंबर की शक्ल में ही सही। लेकिन, जाति के लिए क्या पिनकोड अथवा बैंक खाते की तरह कोई परिवर्तन करना होगा। सियासत में बोई गई सामाजिक न्याय की फसल कोई तो काटेगा। जातीय गौरव के लिए तो राजनीति की पूरी धारा ही बदल दी।  नंबर का साल्यूशन हो तो यह किया जा सकता है कि लास्ट फोर डिजिट जाति और टू डिजिट गोत्र बताएंगे। यादव यदुवंशी, क्षत्रिय राजपूत, कुर्मिय क्षत्रिय, जाट चाहर, ब्राह्मण, जाटव, वाल्मीकि आदि इत्यादि। लेकिन, इसमें सीधे सीधे जाति बता देने वाला थ्रिल नहीं।

महाराष्ट्र के हर्षपाल प्रभू ने यह पत्र लिखा है तो लाजिमी है? कि वहां भी यह समस्या होगी। पर, अपने यूपी में यह जातीय गौरव पिछले दशक भर में शुरू हुआ है। प्रदेश में दोपहिया, तिपहिया और चौपहिया वाहनों की नंबर प्लेटों पर राजपूत, यादव, यदुवंशी, जाट, जाटव आदि लिखकर जातीय गौरव की उद्घोषणा का यह चलन ज्यादा पुराना नहीं है। लेकिन, इधर तेजी से वायरल हुआ है। मोटर वाहन अधिनियम के अंतर्गत नंबर प्लेट पर रजिस्ट्रेशन नंबर के अलावा अन्य कुछ भी लिखना साफ मना है।

शुरुआती दौर में यह परंपरा तब पनपी जब दिल्ली-एनसीआर के तमाम किसान अपनी जमीनें बेचकर लखपति और करोड़पति हुए। पैसा आया तो गाड़ी भी आई और जब गाड़ी आई तो जो लोग पुलिस, प्रेस, विधायक, सांसद, ब्लॉक प्रमुख या प्रधान नहीं लिखा सकते वह अपनी गाडिय़ों में जातीय गौरव का झंडा गाडऩे लगे। ऐसी गाड़ी वालों को सीधे संगठन में पदाधिकारी बनाया जाने लगा। शुरुआत सामाजिक न्याय के क्रीमीलेयर से हुई थी, जब यह फैशन बन गया तो इसमें क्षत्रिय, राजपूत, शुक्ला, मिश्रा, तिवारी सब जुड़़ गए।

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 मोटर वाहन अधिनियम के तहत नंबर प्लेट में कुछ भी लिखना मना है, लेकिन यहां तो जातिसूचक उपाधियां लिखने का चलन गाड़ी की बॉडी या आगे-पीछे के शीशों पर है। इसकी अब तक तो मनाही नहीं, लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा अग्रसारित इस पत्र की भावना के अनुरूप कार्रवाई इन पर भी करनी पड़ रही, लेकिन इनके लिए धारा खोजने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ रही। कई बार लिखने लिखाने वाले अड़ जाते हैं तो किरकिरी भी झेलनी पड़ती है। ऐसे जातीय गौरव वाले मसीहा पिछली सरकारों में तो पनपे ही मौजूदा दौर में भी हैं। कहीं न कहीं पॉलिटिकल कनेक्शन भी निकल आ रहा है। इसलिए पुलिस वाले भी अब थोड़ा नरम होकर समझाने लगे हैं कि भाई-जाति क्यों बता रहे हो साधु की। पब्लिक ध्यान दे तब न!

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