भूटान: मधुर रिश्तों के साथ चुनौतियां भी

वरिष्ठ पत्रकार- शोभित मिश्रा

यूं ही भारत भूटान को महत्व नहीं देता है। भारत की उत्तरी प्रतिरक्षा व्यवस्था में भूटान को अचिल्स हिल की संज्ञा दी जाती है। यह भारत की सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है।

चुम्बी घाटी से चीन की सीमाएं लगभग 80 मील की दूरी पर हैं, जबकि भूटान चीन से अपना लगभग 470 किमी लंबा बॉर्डर साझा करता है।

ऐसे में चीन के विस्तारवादी रुख के मद्देनजर भूटान की सीमाओं को सुरक्षित रखना जरूरी है, क्योंकि इससे न केवल भूटान को, बल्कि उत्तरी बंगाल, असम और अरुणाचल प्रदेश को भी खतरा हो सकता है।

भारत और भूटान के बीच 605 किलोमीटर लंबी सीमा है। वर्ष 1949 में हुई संधि की वजह से भूटान की अंतर्राष्ट्रीय, वित्तीय और रक्षा नीति पर भारत का प्रभाव रहा है। भारतीय सेना भूटान की शाही सेना को आवश्यकता पडऩे पर प्रशिक्षण देती रही है। इधर हालिया कुछ वर्षों में चीन ने भूटान को प्रभावित करने की कोशिश की है।

इस परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि जितना भारत के लिये भूटान के साथ अच्छे संबंध रखना जरूरी है, उतना ही चीन के लिये भी भूटान से बेहतर संबंध रखना जरूरी है। हालांकि, अभी तक भूटान और चीन के बीच कूटनीतिक संबंध नहीं बन पाए हैं।  ऐसे में भूटान के चीन के निकट जाने की फिलहाल कोई सूरत दिखाई नहीं देती।

सामरिक रूप से भूटान का महत्व

भूटान भारत का निकटतम पड़ोसी देश है और दोनों देशों के बीच खुली सीमा है। द्विपक्षीय भारतीय-भूटान समूह सीमा प्रबंधन और सुरक्षा की स्थापना दोनों देशों के बीच सीमा की सुरक्षा करने के लिये की गई है। वर्ष 1971 के बाद से भूटान संयुक्त राष्ट्र का सदस्य है। संयुक्त राष्ट्र में भूटान जैसे छोटे हिमालयी देश के प्रवेश का समर्थन भी भारत ने ही किया था, जिसके बाद से इस देश को संयुक्त राष्ट्र से विशेष सहायता मिलती है। भारत के साथ भूटान के मजबूत आर्थिक, रणनीतिक और सैन्य संबंध हैं।

भूटान सार्क का संस्थापक सदस्य है और बिम्सटेक, विश्व बैंक तथा आईएमएफ  का सदस्य भी बन चुका है। भौगोलिक स्थिति के कारण भूटान दुनिया के बाकी हिस्सों से कटा हुआ था, लेकिन अब भूटान ने दुनिया में अपनी जगह बनाने के प्रयास शुरू कर दिये हैं। हालिया समय में भूटान ने एक खुली-द्वार नीति विकसित की है और दुनिया के कई देशों के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने के प्रयास किये हैं।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नई सरकार का जब गठन हुआ तो विदेश मंत्री पद पर पूर्व विदेश सचिव एस. जयशंकर की नियुक्ति ने एकबारगी सभी को हैरानी में डाल दिया। इस पद पर नियुक्त होने के बाद नए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत की पड़ोसी पहले नीति के तहत अपनी पहली विदेश यात्रा के लिये भूटान को चुना। भूटान के साथ सदियों से भारत के मधुर संबंध रहे हैं और यह भारत का करीबी सहयोगी रहा है।

पिछले कुछ सालों में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों में काफी प्रगति हुई है। विदेश मंत्री के इस दौरे से यह भी स्पष्ट हुआ कि निकट मित्र एवं पड़ोसी भूटान के साथ संबंधों को भारत कितना महत्व देता है। गौरतलब है कि वर्ष 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपने पहले विदेश दौरे के लिये भूटान को ही चुना था। वर्ष 2019 में जब नरेंद्र मोदी ने दोबारा प्रधानमंत्री पद की शपथ ली तो बिम्सटेक देशों के नेताओं को आमंत्रित किया गया था, जिसमें भूटान के प्रधानमंत्री लोते शेरिंग भी शामिल थे।

1949 की भारत-भूटान संधि

भारत की आजादी के बाद 8 अगस्त, 1949 को भारत और भूटान के बीच दार्जिलिंग में एक संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। इसमें अनेक प्रावधान शामिल थे, जिनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण था रक्षा और विदेश मामलों में भूटान का भारत पर आश्रित होना। लंबे समय तक इस संधि के जारी रहने के बाद भूटान के आग्रह पर 8 फरवरी, 2007 को इसमें बदलाव कर अद्यतन बनाया गया। अद्यतन संधि में यह उल्लेख है कि भारत और भूटान के बीच स्थायी शांति और मैत्री होगी। इसमें से ऐसे प्रावधानों को हटा दिया गया, जो समय के साथ अप्रचलित हो गए थे।

अद्यतन संधि में पारस्परिक और दीर्घकालिक लाभ के लिये आर्थिक सहयोग मजबूत करने और उसके विस्तार, सांस्कृतिक, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल तथा विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में सहयोग के नए प्रावधान शामिल किये गए। इसमें दोनों देशों के नागरिकों के साथ व्यवहार अथवा हमारी विद्यमान मुक्त व्यापार व्यवस्था में किसी परिवर्तन की परिकल्पना नहीं है।

यह माना गया कि इस अद्यतन संधि से दोनों देश अपने-अपने राष्ट्रीय हितों से संबंधित मुद्दों पर एक-दूसरे के साथ घनिष्ट सहयोग करने तथा एक-दूसरे की राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों के विरुद्ध क्रियाकलापों हेतु अपने क्षेत्रों का उपयोग न करने देने के लिये प्रतिबद्ध होंगे।

कई दशकों से भूटान के साथ संबंध भारत की विदेश नीति का एक स्थायी कारक रहा है। साझा हितों और पारस्पारिक रूप से लाभप्रद सहयोग पर आधारित अच्छे पड़ोसी के संबंधों का यह उत्कृष्ट  उदाहरण है। यह इस बात का प्रतीक है कि दक्षिण एशिया की साझा नियति है। यही वज़ह है कि आज परिपक्वता, विश्वास, समझ और समझ-बूझ तथा निरंतर विस्तृत होते कार्यक्षेत्र में संयुक्त  प्रयास भारत-भूटान संबंधों की विशेषता है ।

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