गांधी परिवार के चमकार की कम होती चमक

Brajesh Shukla

वरिष्ठ पत्रकार : बृजेश शुक्ल

कांग्रेस की चर्चा चली तो बहुत कुछ याद आ रहा है। एक वह दौर था जब उत्तर प्रदेश के राजनेता रात में लखनऊ मेल से दिल्ली जाते थे और लखनऊ मेल से ही वापस आ जाते थे। इन नेताओं को छोडऩे के लिए कई छुटभैए नेता भी स्टेशन तक जाते थे। एक बार नारायण दत्त तिवारी दिल्ली जा रहे थे और उनको छोडऩे के लिए कुछ नेता भी गए थे। बहैसियत पत्रकार भी हम लोग लखनऊ मेल में यह देखने जाते थे कि कौन नेता दिल्ली गया है, कौन नहीं।

तिवारी को छोडऩे आए कांग्रेसी नेता से पूछा कि नारायण दत्त तिवारी तो लखनऊ में ही रहते हैं। आज दिल्ली जा रहे हैं। दो दिन बाद लौट आएंगे। आप लोग नेताओं को छोडऩे क्यों आते हैं। नेताजी खिलखिला कर हंसे और बोले, अब देखो इनकी। सुकुल महाराज हम तिवारी जी को छोडऩे नहीं आते हैं बल्कि यह संदेश देने आते हैं कि वह दिल्ली जा रहे हैं। दुनिया के सबसे ताकतवर व अनुपम गांधी परिवार से मिलेंगे। उस परिवार के घर के नाबदान यानि नाली का जल मिल जाए और उसे बोतल में भर लाए तो जीवन कृतकृत्य हो जाएगा। सुकुल महाराज गंगा जल के बाद इसी जल का महत्व है।

नेताजी हंसे तो सभी हंसने लगे। वास्तव में गांधी परिवार का जो चमत्कार है वह इस देश के सिर पर चढक़र बोलता रहा है। इस चमत्कार ने देश की राजनीति को बदला भी और इसी चमत्कार ने राजनीति के धुरंधरों को राजा से रंक और रंक से राजा बना दिया। यह मान लिया गया था कि चमत्कार का स्वामी सिर्फ गांधी परिवार है और राजनीति में भारत का शिखर भी वही है।

इसीलिए भारत में लोकतांत्रिक इतिहास के साथ ही चाटुकारिता युग की शुरुआत भी हुई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की एक असहमति की चिट्ठी भी गांधी परिवार और उसके शागिर्दों को बेचैन कर देती है। जहां हां जी, हां जी की आवाज गूंजती रही हो वहां पर सवालों का क्या स्थान बचता है, जबकि परिवार से अलग किसी अन्य दल के नेता की चमत्कारिक छवि सामने आती है और उसके समर्थक भी जय-जयकार करते हैं तो गांधी परिवार का जयकारा लगाने वाले आक्रामक और विद्रोही हो जाते हैं, इसमें आश्चर्य कैसा।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं द्वारा पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखने और उस पर राहुल गांधी एवं प्रियंका गांधी की तीखी टिप्पणी के बावजूद असंतुष्ट नेताओं का मौन न होना, यह सवाल उठा रहा है कि क्या गांधी परिवार का चमत्कार खत्म हो चुका है। गांधी परिवार के प्रति जनता के बीच चमत्कार की ही ताकत ने पार्टी को मजबूती से जोड़े रखा। कांग्रेस कभी उठी और कभी गिरी, लेकिन नेपथ्य में कभी नहीं गई। लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में कांग्रेस बहुत ही कमजोर स्थिति से गुजर रही है।

Gandhi Family

यह सब तब हो रहा है, जब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की खेवनहार श्रीमती प्रियंका गांधी बन गई हैं। वह स्वयं योगी सरकार के खिलाफ कमान संभाले हुए हैं। लेकिन कांग्रेस के तमाम नेताओं को अब भी पार्टी में अपना भविष्य नहीं दिख रहा है। वे लगातार नेतृत्व को पत्र लिख रहे हैं। जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बाकायदा सोनिया गांधी को पत्र लिखकर यह कहते हैं कि अध्यक्ष का चुनाव करा दिया जाए तो इसे नेतृत्व को चुनौती मान लिया जाता है। इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस ने बगावत भी झेली और यह उसके नेतृत्व की बाजीगरी थी कि वह उससे बाहर भी निकली। इस बार हालात कुछ अलग हैं।

कांग्रेस धीरे-धीरे सिमटते हुए ज्यादातर राज्यों में या तो बहुत दुर्बल हो चुकी है या क्षेत्रीय दलों के अधीन काम कर रही है। अब तक कांग्रेस को मजबूती से जोडऩे वाला गांधी परिवार का चमत्कारिक प्रभाव ही था। कांग्रेस नेताओं को यह हमेशा भरोसा रहा कि यह परिवार जब भी मैदान में निकलेगा तो वोट बटोरेगा ही। वास्तव में इस परिवार का चमत्कार इतने लंबे समय तक चला है कि यह मानने में दिक्कत होती है कि गांधी परिवार की चमक अब असर नहीं दिखा रही है। लेकिन अब कांग्रेस के तमाम सहयोगियों ने ही यह मान लिया है इस परिवार के चमत्कार को नमस्कार अब बेकार है।

1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जिस तरह से अभूतपूर्व जनसमर्थन के साथ राजीव गांधी सत्ता में आए थे, उससे तो यही लगता था इस परिवार की चमक समाप्त होने वाली नहीं है। लेकिन 5 वर्ष में ही राजीव गांधी की चमक भी फीकी पड़ी और 1989 के चुनाव में राजीव गांधी चुनाव हार गए। यह विडंबना ही है की 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जो सहानुभूति का तूफान आया था, वैसा तूफान 1991 की लोकसभा चुनाव के बीच राजीव गांधी की हत्या के बाद देखने को नहीं मिला। चुनाव के बीच में ही राजीव गांधी की हत्या हो गई थी और लग रहा था कि पासा पलट चुका है। कांग्रेस एक तूफान की तरह आने वाली है, लेकिन जब चुनावी बक्शे खुले तब पता चला कि हत्या का असर उत्तरी राज्यों में बिल्कुल नहीं पड़ा। उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस के बजाय बीजेपी सत्ता में आ गई।

1989 में जब कांग्रेस उत्तर प्रदेश चुनाव हार गई, तब पार्टी के नेताओं ने कल्पना भी नहीं की थी कि उन्हें इतना लंबा वनवास झेलना पड़ेगा। यह विडंबना है कि कांग्रेस नेताओं को अपने पुरुषार्थ पर कम, चमत्कार पर ज्यादा भरोसा रहा है। इसीलिए जब 1999 में गांधी परिवार एक बार फिर राजनीति में लौट आया तो कांग्रेस के नेताओं को लगा कि अब दिन बहुरने वाले हैं।

जब राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार शुरू किया तब भी इसी तरह की उम्मीदें बंधीं थीं। उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी ने पार्टी को उठाने के लिए तमाम प्रयास किए। राज्य भर का दौरा किया। दलितों के घर रात्रि विश्राम किया, लेकिन परिणाम शून्य रहा। तमाम प्रयासों के बाद भी जब राहुल गांधी का चमत्कार असर नहीं दिखा सका तो कांग्रेस के अंदर निराशा का भाव पैदा हो गया। हालत यह है उत्तर प्रदेश में कांग्रेस चौथे नंबर की पार्टी है। कमोबेश यही हालत बिहार की है। झारखंड में उसे हेमंत सोरेन से समझौता करना पड़ा।

दिल्ली में वह तीसरे नंबर की पार्टी है। कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में भी कांग्रेस की हालत बहुत पतली है। चमत्कार की आस लगाए कांग्रेसी नेताओं को लगता था कि यदि राहुल गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बना दिया जाए तो फिर कोई चमत्कार जरूर बरसेगा। बहुत ही योजनाबद्ध ढंग से राहुल गांधी को राजनीति की सीढिय़ां चढ़ाई गईं लेकिन परिणाम कोई नहीं आया। राहुल पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए, लेकिन इसके बाद कांग्रेस की हालत और दयनीय हो गई। अध्यक्ष रहते हुए भी वह अमेठी लोकसभा क्षेत्र से स्वयं चुनाव हार गए।

गांधी परिवार में ही अपना भविष्य सुरक्षित तलाश रहे कांग्रेसियों को लगा कि राहुल गांधी तो कुछ नहीं कर पा रहे हैं, शायद प्रियंका गांधी इंदिरा गांधी की तरह ही साबित होंगी और कांग्रेस शिखर तक पहुंच जाएगी।  पिछले 20 साल से प्रियंका जी अब आ रही हैं, वह राजनीति में अब आने ही वाली हैं आदि शोरगुल, रहस्य व अटकलों के बीच 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले जब प्रियंका गांधी राजनीति में आईं तो कांग्रेस नेताओं को लगा कि अब सब कुछ बदलने जा रहा है। l

उत्साह से लबरेज उत्तर प्रदेश सचिवालय में कांग्रेस के एक नेता मिले थे और कहने लगे कि सपा और बसपा का गठबंधन भी ऐसे गलत समय हुआ, जब प्रियंका राजनीति में आ गई हैं। अब तो भाजपा का ही सफाया नहीं होगा, बल्कि महागठबंधन का भी सूपड़ा साफ हो जाएगा। इसी दिवास्वप्न में जीते कांग्रेसियों ने प्रियंका गांधी में इंदिरा गांधी की तलाश शुरू की। बस यह साबित करने की होड़ रही कि प्रियंका में इंदिरा गांधी की छवि दिखती है। उसी तरह चलती हैं, उसी तरह देखती हैं, वैसा ही राजनीतिक चातुर्य है, वैसे ही हाव-भाव हैं, काम करने का तरीका भी उसी तरह है। चमत्कार की आस में फंसे कांग्रेसी शायद जमीनी सच्चाई को नहीं समझ पा रहे हैं। परिणाम सामने है। 2017 और 2019 के चुनाव में दौरा करने के बाद हर जगह एक बात देखने को मिली कि अब जनता की नजरों में चमत्कार को नमस्कार बेकार है। लोग अब परिणाम की बात करते हैं, किसी परिवार की नहीं। लेकिन कांग्रेस के नेता अब भी चमत्कार की आस लगाए बैठे हैं।

यह आस पूरी होगी या नहीं होगी, पता नहीं लेकिन कांग्रेस नेताओं के एक बड़े धड़े को अब भी यही यकीन है कि पार्टी का उद्धार राहुल और प्रियंका ही कर सकते हैं। केवल इस उम्मीद के सहारे चल रही कांग्रेस के लिए आगे का रास्ता बहुत कठिन है।

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