UP News : पाठा गैंग का सफाया करने में कामयाब हुई पुलिस, मार गिराए कई दुर्दांत डकैत

चित्रकूट। धार्मिक और अध्यात्म की दृष्टि से चित्रकूट विश्व प्रसिद्ध है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यानी डकैत समस्या से यहां पर लोग आने से कतराते हैं। पाठा की भूमि डकैतों से मुक्ति के लिए लंबा सफर किया और आखिरकार शनिवार से यह भूमि डकैतों से उस समय मुक्ति हो गई जब एसटीएफ ने साढ़े पांच लाख रुपये के ईनामी गौरी यादव को मार गिराया। गौरी यादव के मारे जाने के बाद एसटीएफ पाठा में डकैतों के सफाया करने में सफल रही। हालांकि छोटे डाकुओं व अपराधियों को स्थानीय पुलिस मारती रही लेकिन ददुआ, ठोकिया, रागिया, बलखड़िया जैसे कुख्यात डाकुओं को एसटीएफ ने ही मारा है।

डकैत

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर बसा बुन्देलखण्ड का चित्रकूट जनपद विगत चार दशकों से दुर्दांत डकैतों के आतंक का शिकार रही है। विंध्य पर्वत श्रृंखला के बीच बसा होने के कारण पाठा का बीहड़ भौगोलिक दृष्टि से डकैतों के लिए खासा सुरक्षित ठिकाना रहा है।

सात लाख का इनामी था डकैत ददुआ

चित्रकूट के देवकली गांव में जन्मे दुर्दांत डकैत शिवकुमार उर्फ़ ददुआ का आतंक सबसे सबसे लम्बे समय तक रहा। सन 1982 में अलग गैंग बनाने के बाद ददुआ ने 19 जुलाई 1986 को रामू का पुरवा गांव में एक साथ 09 लोगो का सामूहिक नरसंहार कर अपने पिता की मौत का बदला लेकर कोहराम मचा दिया था।इसके बाद वर्ष 1992 में मडैयन गांव में तीन लोगो की हत्या करने के बाद गांव में आग लगा दी थी। इसके बाद पुलिस मुखबिरी के अंदेशे में लोहघटा गांव में वर्ष 2001 में चंदन यादव की गर्दन काटकर दहशत फ़ैलाने के लिए कटे सिर को लेकर पूरे गांव में घुमाया था। इसके बाद कर्वी शहर के एक पेट्रोल पम्प मालिक के बेटे का दिनदहाड़े अपहरण कर हड़कंप मचा दिया था। करीब तीन दशक तक आतंक का पर्याय रहे ददुआ ने पाठा में अपना आतंक का साम्राज्य चलाया। यूपी से पांच और एमपी से दो लाख कुल सात लाख के ईनामी दस्यु ददुआ ने 2004 के लोकसभा चुनाव में सपा का खुला प्रचार किया। ददुआ के समर्थन से सपा लोकसभा चुनाव जीतने में कामयाब रही। इसके बाद ददुआ ने अपने भाई बाल कुमार और पुत्र वीर सिंह को राजनीति में उतारा। वर्ष 2005 में ददुआ ने अपने पुत्र वीर को निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष बना कर अपना रसूख दिखा दिया। इसके बाद वर्ष 2007 में सूबे में बनी बसपा सरकार ददुआ के सफाये में जुट गई। सरकार ने एफटीएफ की विशेष टीम को ददुआ आपरेशन में लगाया। टीम की कमान सँभालने वाले एफटीएफ के जाबांज अधिकारी अमिताभ यश और अनंत देव की टीम ने 22 जुलाई 2007 को मानिकपुर के झलमल जंगल में ददुआ अपने गैंग के साथ एफटीएफ के साथ हुई मुठभेड़ में मारा गया।

छह लाख का इनामी था डकैत ठोकिया

चित्रकूट जिले के भरतकूप क्षेत्र के सिलखोरी गांव में वर्ष 1972 में जन्मे अम्बिका पटेल उर्फ़ डॉक्टर और ठोकिया अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए डकैत बना था। दस्यु ठोकिया पर उत्तरप्रदेश तथा मध्यप्रदेश में पांच दर्जन से अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज थे। उत्तरप्रदेश प्रदेश से पाँच लाख रुपए तथा मध्यप्रदेश से एक लाख रुपए का इनाम घोषित था। ददुआ के सफाये के बाद 22 जुलाई 2007 को लौट रहे एसटीएफ के जवानों पर घात लगाकर ठोकिया गिरोह ने साथ अंधाधुंध फायरिंग कर 6 कमांडो की हत्या कर दी थी। इसके बाद यूपी एसटीएफ ने ठोकिया का सफाया करने की कसम खाई। करीब 13 महीने तक जंगल की खाक छानने के बाद 04 अगस्त 2008 को डकैत ठोकिया के ही गांव सिलखोरी में एफटीएफ ने उसे मुठभेड़ में मार गिराया।

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साढ़े पांच लाख का इनामी था गौरी यादव

चित्रकूट जिले के बहिलपुरवा थाना क्षेत्र के बेलहरी गांव निवासी गौरी यादव ने लगभग दो दशक पहले अपराध की दुनिया में कदम रखा था। वर्ष 2005 में दस्यु गौरी यादव ने अपना अलग गैंग बनाया था। ददुआ और ठोकिया के मारे जाने के बाद 2009 में गौरी यादव भी गिरफ्तार हुआ था। दो साल के बाद में वह जमानत पर जेल से बाहर आ गया था। फरार डकैत गौरी यादव पर यूपी से पांच लाख और एमपी से पचास हजार का इनाम घोषित था। दस्यु गौरी यादव पर यूपी और एमपी के विभिन्न थानो में हत्या, अपहरण, फिरौती तथा सरकारी काम में बाधा डालने के करीब पांच दर्जन मामले दर्ज है। दस्यु गौरी यादव ने मई 2013 में दिल्ली से मामले की जांच करने पहुंचे दरोगा की हत्या कर दी थी। इसके बाद मई 2016 में गोपालगंज में तीन ग्रामीणों को खंभे से बांधकर गोली मार कर सनसनी फैला दी थी। ईनाम की राशि बढ़ने के बाद यूपी एसटीएफ ने चित्रकूट के जंगलो में डेरा डाल दिया था। शुक्रवार की रात मुखबिर से मिली सूचना के आधार पर बहिलपुरवा के जंगल में घेरा बंदी कर एडीजी अभिताभ यश के नेतृत्व में एसटीएफ की टीम,ने शनिवार तड़के मुठभेड़ में दस्यु गौरी यादव को मार गिराया। हैरानी की बात यह रही कि चित्रकूट पुलिस को तीनो दुर्दांत डकैतों का सफाया करने वाली यूपी एसटीएफ के आपरेशन के भनक तक नहीं लगी।

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