खरी-खरी: नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए

Urmil Kumar Thapliyal

उर्मिल कुमार थपलियाल

मो. 9795349246

एक जमाना था जब बच्चों का ननिहाल होता था। वहां नानी होती थी और एक मसल के अनुसार उसकी दुम में खटखटा नहीं होता था। बच्चों को गर्मियों की छुट्टियों में ननिहाल याद आता था और वहां जाना लोकोत्सव की तरह लगता था। नानियों-दादियों को ढेरों कहानियां याद रहती थीं। चूंकि शायद मोरों की नानियां नहीं हाती थीं इसलिये मोरो की नानियों को उठाकर ले जाते और कहानियां सुना करते थे। नानी नाना का लाड़ दुलार मां बाप से भी ज्यादा अच्छा लगता था। बच्चे ननिहाल से अच्छी सेहत बना कर लौटते थे। आज के बच्चे बुढ़िया नानी पसंद नहीं करते। नानियों को भी मोबाइल से फुर्सत नहीं मिलती।

किसी जमाने में दादियां जो हैं वो नानियों से डाह रखती थीं क्यूंकि बच्चे नानियों को ज्यादा पसंद करते थे। दादियां तो घर का जोगी समझी जाती थीं। अब गर्मियों की छुट्टियों में हॉबी क्लासेज ज्वाइन कर लेते हैं। वे इन क्लासेज में पापेले मुंह वाली नानी के बजाय गाना, नाचना, पेंटिंग करना चाहते हैं। वो ये नहीं जानते कि आधुनिकता उनसे उनका बचपन छीन रही है। अब तो बचपन की मार्केटिंग का समय है। बच्चे अपने बचपन से बड़े होकर समय से पहले मुहम्मद रफी और लता मंगेशकर बनने के चक्कर में हैं। बच्चों की दाढ़ी मूछें कुछ जल्दी निकलने लगी। जो बच्चा बड़े जैसी बातें करे उसे होनहार माना जाता है। कई बच्चे अपने बाप से खुन्नस निकालने लगे कि उन्होंने उनकी इकलौती मम्मी को काम वाली बना कर रख दिया।

उधर, कई बाम कामवाली बाई को ज्यादा पसंद करते हैं क्यूंकि वो उनकी बीवी नहीं होती। मां-बाप भी कम नहीं हैं वो चाहते हैं कि जो काम वो न कर सके उनके बच्चे पूरा करें। कोई बाप नहीं चाहता कि उनका बेटा हाई स्कूल में उनकी तरह दो-दो बार फेल हो। अभी पिछले साल लखनऊ की एक साल की लड़की ने हाईस्कूल पास करके गिनीजबुक में अपना नाम दर्ज कराया आजकल वो मिस युनिवर्स होने के सपने देख रही हैं। बच्चे जो कीर्तिमान बना रहे हैं उनमें ननिहाल की स्मृति कही नहीं है। दादा-दादी, नाना-नानियों के दिन तो लद लिए। मैंने एक बच्चे से पूछा-तुम्हारे दादा जी का नाम क्या है। बच्चा चुप।

मैं। अच्छा दादी का क्या है। नानी का क्या है। बच्चा लगातार चुप। सच ये है कि आजकल बचपन चाहता कौन है। सब कुछ फास्ट फूड। यूज एण्ड थ्रो। खाओ और फेंको। आजकल ग्रांड पा और ग्रेनी की किसी को जरूरत नहीं है। नानी चाहती है कि उसमें मम्मी वाला ग्रेस बना रहे। यह ग्रेस पापा को भी अच्छा नहीं लगता है। वैसे भी अब जी लगाने का चलन नहीं रहा। मामू, दादू, नानू का चलन है। शॉर्ट कट का जमाना है यह शायद संयोग नहीं है कि बचपन खोते जा रहे बच्चे इधर ज्यादा कुशाग्र होने लगे हैं। एक दिन मुझसे पोते ने पूछा-दादू आप हमारे पास क्यूं रहते हैं। मैंने कहा-क्यूंकि मैं तुम्हारे पापा का पापा हूं। उसने एक कुशल मासूमियत से कहा तो आप अपने पापा के साथ क्यूं नहीं रहते। आप आपके रहने से मुझे अपनी फेमिली एक क्राउड लगने लगती है। मगर मैं ही ऐसा क्यों सोचता हूं। मैं यही जवाब दे पाया कि बेटा जो बच्चे अपना बचपन लांघ जाते हैं वो ऐसा ही सोचते हैं। तुम्हें तो बेटा अब डालडा भी नसीब नहीं। मुझे नहीं पता जो हमारी नानियों को ले जाते हैं वो उन्हें वापस क्यूं नहीं करते।

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