रोशनी के त्योहार में करें पटाखों से तौबा, अर्से तक रहता है पटाखों से निकले धुएं का असर

अनिल मिश्रा

शाहजहांपुर। दीपावली रोशनी का त्योहार है, इसलिए इसे पटाखों की कानफोड़ू आवाज से खराब न करें। तेज आवाज वाले पटाखों से तौबा कर इस दीपावली पर घर व उसके आसपास साफ-सफाई करें। घर में रोशनी कर दीपावली मनाएं। देखिएगा त्योहार की खुशियों में चार चांद लग जाएंगे।

चिकित्सकों के अनुसार दीपावली के मौके पर होने वाली आतिशबाजी का असर वायुमंडल पर लंबे समय तक रहता है। पटाखों के जलने से निकलने वाली घातक गैसें जैसे सल्फरडाइ आक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड, कार्बनडाइ आक्साइड, कार्बनमोनो आक्साइड के कारण हवाएं जहरीली हो जाती है।

इसके चलते लोगों की सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ता है। खासतौर पर नन्हें-मुन्नों व बुजुर्गों की सेहत पर बन आती है। एलर्जी से परेशान लोगों के लिए तो मुसीबत बेहद बढ़ जाती है। आंकड़ों के अनुसार पटाखों से होने वाले शोर में थोड़ी सी कमी भी आई है, लेकिन जरूरत इस बात की है कि तेज आवाज वाले पटाखों से या तो लोग तौबा कर लें अथवा कम से कम इस्तेमाल करें।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार पटाखों से दीपावली की रात वायुमंडल में निलंबित कणकीय पदार्थो के साथ जहरीली गैसों जैसे नाइट्रोजन आक्साइड, सल्फरडाई आक्साइड, कार्बनडाइ आक्साइड, कार्बनमोनो आक्साइड का स्तर कई गुना बढ़ जाता है।

वातावरण में भारी धातुओं जैसे काॅपर, जिंक, आयरन, मैगनीशियम की मात्रा भी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। यह सभी स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक है। चिंता की बात यह है कि निलंबित कणकीय पदार्थों (एसपीएम) का प्रभाव तो कुछ दिनों में कम हो जाता है। लेकिन हानिकारक गैसों का असर लंबे समय तक बना रहता है।

भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार वायुमंडल में सल्फर व नाइट्रोजन के आक्साइड की मात्रा बढ़ने से आंखों में जलन व सूजन की समस्या हो जाती है। हवाओं में जहरीले नन्हें कणों की मात्रा बढ़ने से सांस व दिल के रोगियों की समस्याएं बढ़ जाती है।

बढ़ जाते है बहरेपन के मरीज : डा संजय पाठक

ईएनटी विशेषज्ञ डा. संजय पाठक बताते है कान के पास पटाखा दगने से अचानक सुनाई पड़ना बंद हो सकता है। दरअसल कभी-कभी तो किसी को कुछ घंटों के बाद ही वापस सुनाई पड़ना शुरू हो जाता है, जबकि कुछ मरीजों को ठीक होने से समय लग जाता है। यहां तक कि आपरेशन की नौबत तक आ जाती है।

डा. पाठक बताते हैं कि पटाखों का शोर कान के सेंसरी न्यूरल व कंडक्टिव अपरेटस को प्रभावित करता है। अक्सर हड्डी भी खिसक जाती है। इसलिए तेज आवाज वाले बम आदि से दूर ही रहना उचित है।

बारूदी खेल का श्वसन तंत्र पर अटैक : डा. रवि मोहन

दीपावली पर पटाखे फोड़ना भले ही आपको रास आता हो। मगर खुशियों के त्योहार में ये बारूदी खेल किसी की सेहत भी बिगड़ सकते है। कारण, पटाखों से निकलने वाला जहरीला धुआं सीधे श्वसन तंत्र पर हमला करता है, जोकि अस्थमा जैसे रोगी की जान पर भारी पड़ सकता है।

डा. रवि मोहन के मुताबिक पटाखा फोड़ने पर कई खतरनाक गैसें निकलती है। मसलन फास्फोरस कंपाउंड की सल्फर डाई आक्साइड, कार्बन मोना आक्साइड हवा में घुलकर अस्थमा व सीओपीडी के मरीजों के लिए मुसीबत बन जाती है।

डा. रवि मोहन कहते हैं कि हवा में घुले रासायनिक कणों का श्वसन नलिका में पहुंचने पर म्यूकस का स्त्राव अधिक होने लगता है। इससे श्वसन नली की संवेदनशीलता बढ़ जाती है और व्यक्ति की सांस फूलने लगती है।

ऐसे में खांसी आदि अधिक आने पर फेफड़े को जाने वाली श्वसन नली में रेप्चर भी हो जाता है जोकि व्यक्ति के मौत का कारण बन जाता है। उन्होंने बताया कि दीपावली के दौरान रासायनिक कणों की हवा में मौजूदगी अस्थमा अटैक के खतरे को कई गुना बढ़ा देती है।

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