गांधी के वैष्णव जन

आशीष बाजपेई
वरिष्ठ पत्रकार

महात्मा गांधी के जन्म के 150 साल पूरे हो 151 जन्मदिन आ पहुंचा है। इस साल जब दो अक्टूबर को गांधी जयंती मनाई जाएगी तब तक राम मंदिर की बुनियाद खुदने का काम जोरों पर होगा और साथ ही रामराज की चर्चा भी चारो ओर होगी। गांधी के राजराज, सुराज के सपने की बुनियाद में वैष्ण जन और हरि के जन थे और आज वो क्या कर रहे हैं ये सवाल सबसे अहम है। गांधी के प्रिय भजन में वैष्णव जन का नाम आता है जो दूसरों की पीर को जानते समझते हैं। गांधी के हरि के जन त्याज्य नहीं हैं। कमजोरी को ही ताकत बना लेना गांधी की विशेषता थी और यही अहिंसा उनका सबसे बड़ा हथियार बना जो आज भी दुनिया भर को उनकी राह पर चलने को मजबूर करता है। दक्षिण अफ्रीका में गोरों से मिले अपमान का मतलब समझ गांधी ने उसका व्यक्तिगत समझ को सार्वजनिक बनाया।

गांधी ने सत्याग्रह शब्द का आविष्कार किया। सत्य ही ईश्वर है की जगह ईश्वर ही सत्य है, कहना शुरु किया। आत्मनिर्भर भारत अभियान के इस दौर में गांधी का हिंद स्वराज का सपना सामने आता है जिसे उन्होंने अपने जैसे दूसरे भारतीय विनायक दामोदर सावरकर से लंदन में हुए शास्त्रार्थ के बाद लिखी। अगर एक वाक्य में गांधी को समझें तो शायद वो पहले व्यक्ति थे, जिनकी असल और दोहरी जिंदगी में सबसे कम अंतर था। जो कहते थे करने को उसे सबसे पहले खुद में उतारते थे। गांधी ने रामराज का सपना वैष्णव जन के सहकार, सहयोग के साथ देखा था। गांधी भारतीय समाज में छुआछूत गैरबराबरी को किसी हिंसक संघर्ष के साथ नहीं बल्कि हाशिये पर बैठे लोगों को हरि का जन मानते हुए उन्हें गले लगाते हुए दूर करना चाहते थे और इसी के लिए जीवन भर खपे। नि:संदेह गांधी का जीवन और दर्शन लोगों को सम्मोहित करने के साथ ही अचंभित करता है। कुछ को उलझन में डालता है। बहुत सी विचारधाराओं के पोषकों के लिए गांधी का जीवन एक चुनौती है और उनमें उन्हें लेकर घृणा भी है। इसी घृणा ने हिंसा का रुप लेकर तो उनकी जान ले ली और आज भी जिंदा है। हालांकि आज उनसे घृणा करने वालों ने यह देखकर कि मारकर भी गांधी जिंदा रह गए हैं, तो उन्हें राज्यसत्ता के संरंक्षण में ले लिया है। आज गांधी के नाम का जाप वही ताकतें सबसे ज्यादा कर रही हैं। इनमें वो वैष्णव जन भी हैं और हरि के जन भी। आखिर सत्ता को आज गांधी की सबसे ज्यादा जरुरत है।

सवाल खड़ा होता है कि आज 151 साल के बाद भी गांधी जिंदा होते तो किसके साथ खड़े होते और किसके दम पर अपने सपनो को साकार करने का बीड़ा उठाते। आज जब रामराज की चर्चा चंहुओर है तो सवाल खड़ा होता है कि गांधी के वैष्णव जन और हरि के जन उनके सपने को साकार करने के लिए क्या कर रहे हैं।

जाहिर है आज गांधी कम से कम उन राजसत्ता चलाने वाले वैष्णव जनों या हरि के जनों के साथ तो नहीं ही खड़े होते जो हर सांस उनके सपने को कुचलने पर आमादा हैं। बल्कि गांधी उनके साथ होते जो रामराज का गान भले न कर रहे हों पर हर कमजोर के पक्ष में खड़े जरुर हैं। उन नेताओं के सर पर हाथ रखते जो जन के हक में खड़े हैं। उन लोगों को वैषणव जन या हरि के जन कहते जो आज भी असली सुख सुराज वाले और गैरबराबरी रहित राज को लाने के लिए संघर्षरत हैं।

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