संपादकीय : ऊर्जा कर्मियों की हड़ताल

ऊर्जा कर्मियों

ऊर्जा कर्मियों के कार्य बहिष्कार कर देने से सूबे में बिजली संकट पहले दिन से ही नजर आने लगा। अनपरा और ओबरा बिजली घर की इकाइयों में काम बंद होने से उत्पादन ठप हो गया। जब बिजली तैयार ही नहीं होगी तो वितरित कहां से होगी। जाहिर है आम लोगों को बिजली के संकट से जूझना होगा। सोमवार को पहले ही दिन लखनऊ में कई मंत्रियों तक को इस संकट से दो-चार होना पड़ा।

इसे देखते हुए ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने हड़ताली कर्मचारियों की बात मान ली, लेकिन ऊर्जा निगम के चेयरमैन और प्रमुख सचिव ऊर्जा अरविंद कुमार न तो कोई बात मानने को तैयार हुए और न ही समझौते पर हस्ताक्षर करने को। विचार का विषय यह है कि जब ऊर्जा मंत्री पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम का निजीकरण टालने को तैयार थे, अन्य ऊर्जा निगमों की हालत सुधारने को राजी थे, तब चेयरमैन को क्या आपत्ति थी। यह तो वही स्थिति थी कि सरकार तैयार पर नौकरशाह का इनकार। क्या ऐसा संभव हो सकता है। ऐसी स्थिति में इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता कि ऊर्जा मंत्री और चेयरमैन के बीच पहले से ही इस तरह की कोई अंडरस्टैंडिंग रही हो।

जो भी हो हड़ताल खिंच भी सकती है और समाप्त भी हो सकती है। मुख्य मुद्दा है निजीकरण का। सरकार अधिकांश सेक्टरों में इसे लागू करने का प्रयास कर रही है। ऊर्जा निगम के ही बिल वसूली समेत कई काम निजी सेक्टर में दिये जा चुके हैं। ऐसे में कब तक वितरण निगम निजीकरण से दूर रह सकेंगे। मान लिया कि हड़ताल या कार्यबहिष्कार सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर सकते हैं, लेकिन ये अंतिम विकल्प नहीं है। अगर अभी निजीकरण टल भी गया तब भी यह तलवार तो सिर पर लटकी ही रहेगी। मूल विषय यह है कि निजीकरण को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है। रक्षा जैसे संवेदनशील सेक्टर का भी कुछ हिस्सा निजी हाथों में दिया जा रहा है।

देश की सबसे बड़ी रेलवे सेवा के भी निजीकरण के लिए कदम उठाये जाने लगे हैं। सरकार ऐसा क्यों कर रही है। सामान्यत: इसके दो ही कारण माने जा सकते हैं। पहला कारण यह कि सरकार निहित स्वार्थों के चलते इस तरह के कदम उठा रही हो और दूसरा कारण यह कि सरकारी कर्मचारी अपने उत्तरदायित्व का करीने से निर्वाह न कर रहे हों और सरकार को लाचारी में इस तरह के कदम उठाने को विवश होना पड़ रहा हो। उदाहरण के लिए यहां बिजली सेक्टर की बिल वसूली को ही लेते हैं। कुछ वर्ष पहले तक लोगों पर लाखों रुपये बिजली के बकाया होते थे और उनकी बिजली जलती रहती थी।

अधिकारी वर्ग इनकी बिजली काटने तक का साहस नहीं करता था, लेकिन जैसे ही इसे निजी हाथों में दिया गया, बिल की धड़ल्ले से वसूली होने लगी। बिल काउंटर पर उपभोक्ताओं की लाइनें लगने लगीं। यह परिवर्तन क्यों आया। जाहिर है कि जब बिजली कनेक्शन कटने शुरू हो गये तो लोगों में भय पैदा हुआ। विद्युत वितरण की बात पर आते हैं। हर बार लाइन लॉस घटाने की बात होती है, लेकिन यह बढ़ता ही जाता है। वस्तुत: लाइन लॉस की एक सीमा होती है, इसके बाद होने वाला लॉस तो विद्युत चोरी होती है, जो उसी महकमे के कर्मचारी कराते हैं। बेहतर हो कि सरकार और कर्मचारी दोनों अपने-अपने दायित्व का ईमानदारी से निर्वहन करें। हां, एक बात साफ है कि अगर सरकार की नीति ही निजीकरण की हो गयी है तो हड़ताल, कार्यबहिष्कार कर इसे टाला तो जा सकता है, लेकिन समाप्त नहीं कराया जा सकता।

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