संपादकीय : टूटती वर्जनाएं

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भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (1) हम सभी को बोलने की आजादी यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। वैसे देखा जाये तो अभिव्यक्ति की स्‍वतंत्रता अपने भावों और विचारों को व्‍यक्‍त करने का एक राजनीतिक अधिकार है। इसके तहत कोई भी व्‍यक्ति न सिर्फ विचारों का प्रचार-प्रसार कर सकता है,  बल्कि किसी भी तरह की सूचना का आदान-प्रदान करने का अधिकार रखता है। देश और दुनिया में अभिव्यक्ति की आजादी ही समाचार पत्रों और फिर बाद में न्यूज चैनलों का आधार रहा। जहां लोगों को सूचनाएं देना और उनकी बातों को सरकार तक पहुंचाना एक मिशन हुआ करता था।

लेकिन, व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा में यह मिशन अपनी राह से भटका तो वह सीधा बाजार में जा खड़ा हुआ,  जहां पेड न्यूज, एक विशेष वर्ग के खास एजेंडे, एक-दूसरे से ज्यादा सनसनीखेज खबरें पेश करने की होड़ में टूटती वर्जनाओं का अक्स साफ नजर आता है।

ऐसे में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी अभिव्यक्ति की आजादी से भटक चुके मीडिया के लिए शर्मनाक है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हाल के समय में बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का सबसे ज्यादा दुरुपयोग हुआ है। तबलीगी जमात को लेकर प्रसारित की गई सनसनीखेज और चौंकाऊ खबरों के साथ ही न्यूज चैनलों की डिबेट पर भी सुप्रीम कोर्ट ने उंगली उठायी।

यहां एक पुरानी कहानी याद आ जाती है, जिसमें एक लड़का छड़ी घुमाते हुए जा रहा था और सामने से आ रहे बूढ़े व्यक्ति के नाक पर दे मारा। बूढ़े व्यक्ति के विरोध पर उस लड़के ने बोला कि यह हमारी स्वतंत्रता है, मैं कुछ भी कर सकता हूं। तब इसका जवाब आया वह बहुत मायने रखता है। उत्तर था कि तुम्हारी स्वतंत्रता वहीं खत्म हो जाती है जहां से मेरी नाक शुरू होती है।

तबलीगी वाले मामले में मीडिया ने अभिव्यक्ति की आजादी का कुछ ऐसा ही गलत इस्तेमाल धड़ल्ले से किया। एक खास जमात के बहाने एक वर्ग विशेष को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ​न्यूज से लेकर ​डिबेट तक में उन तमाम वर्जनाओं को लांघा गया, जिनका पालन मीडिया के लिए उतना ही अनिवार्य है, जितना कि अपने अधिकार की पैरवी करना।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दो तरह से अपने मार्ग से भटक सकती है। पहला, किसी अन्य आदमी पर निजी शब्द बोल कर और दूसरा समाज और राष्ट्र के खिलाफ कोई भाषण दे कर। कहते हैं कि बात निकली है तो दूर त​लक जाएगी…सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भी महज तबलीगी जमात के मामले में रिपोर्टिंग को लेकर ही नहीं है। आने वाले समय में मीडिया के लिए यह सेंशरशिप जैसा भी साबित हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट का सूचना एवं प्रसारण सचिव को एक हलफनामा दाखिल करने और इसमें इस तरह के मामलों में मीडिया की अभिप्रेरित (भावनाएं भड़काने वाली) रिपोर्टिंग को रोकने के लिए उठाए गए कदमों का विवरण देने के लिए कहना,  दूरगामी इशारा करता है।

आने वाले समय में इस हलफनामे की आड़ में सरकारें आपकी अभिव्यक्ति की आजादी को कुचल भी सकती हैं। हालांकि मीडिया को यह बात भी जेहन में रखनी होगी कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सार्वभौमिक नहीं है और इस पर समय-समय पर युक्ति-नियुक्ति निर्बंधन लगाए जा सकते हैं। लोकतंत्रात्मक प्रणाली में राष्ट्रहित सर्वोपरि होता है, साथ ही कानून का शासन भी होता है। ऐसे में किसी का भी कदम अगर राष्ट्र की अस्मिता को चोट पहुंचाने वाला हो तो उस पर बंदिश लगाई जा सकती है।

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