संपादकीय : उम्मीद जगाता है आरटीआई

RTI

आज से 15 साल पहले आरटीआई कानून यानी सूचना का अधिकार कानून को अमल में आया था। उस समय उम्मीद जगी थी कि जनता के अधिकारों जो लालफीताशाही और बाबुओं के जंजाल में उलझकर रह जाते हैं, उसका सच सामने आयेगा। इसके साथ ही लोगों को उनका लाभ मिल सकेगा। पिछले डेढ़ दशक में यह कानून लोगों का कारगर हथियार बना।

लोगों के हकों पर जमी विभागीय कुंडली का तोड़ निकला। भ्रष्टाचार नियंत्रण के मामलों से जुड़ी शोध संस्था ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया (टीआईआई) ने अपनी रिपोर्ट आरटीआई कानून लागू होने के बाद देश में महज 3.32 करोड़ लोगों ने ही इस अधिकार का इस्तेमाल किया है।

इसको लेकर यह संस्था निराशा व्यक्त करती है। लेकिन, इस कानून को लेकर संस्था के विचार वैसे ही हैं जैसे कि आधा भरा गिलास। 135 करोड़ की आबादी वाले भारत में तमाम विपरीत हालात के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में लोग इस कानून का इस्तेमाल कर रहे हैं तो यह सकारात्मक है। निरक्षरता ही नहीं भाषाई विविधता वाले इस देश के तमाम राज्यों में आज भी आरटीआई की वेबसाइट में स्थानीय भाषा का विकल्प ही नहीं है। लोगों की सहूलियत के लिए 29 में से केवल 8 राज्य ही अपनी वेबसाइट में स्थानीय भाषा का इस्तेमाल करते हैं।

इतना ही नहीं जिस दौर में सूचना तकनीकी का बोलबाला है और ज्यादातर लोग डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करना पसंद कर रहे हैं, वहां 29 में से सिर्फ 11 राज्यों में ऑनलाइन अपील की सुविधा। 29 में से 14 राज्य मामलों की स्थिति अपडेट करते हैं जबकि 8 मामले के निपटारे और लंबित की सूचना देते हैं।

केवल हरियाणा और मणिपुर ही अपने सूचना आयुक्तों की संपत्ति का विवरण सार्वजनिक करते हैं। ये तमाम कारक हैं, जिन्हें अभी आम सहूलियत के लिहाज से ढलना बाकी है। इन विपरीत हालातों के बावजूद यदि देश में 3.32 करोड़ लोग आरटीआई का इस्तेमाल कर रहे हैं तो यह आंकड़े उम्मीद जगाते हैं।

एक बात और कि मान भी लिया जाये कि आरटीआई इस्तेमाल करने वालों का यह आंकड़ा बढ़ जाये तो क्या मौजूदा तंत्र खुद को इसके अनुकूल ढाल सका है। सच पूछिये तो बिल्कुल नहीं। आरटीआई कानून को प्रभावी बनाने के लिये केन्द्र एवं राज्यों के स्तर पर गठित सूचना आयोगों में खाली पड़े पद इसका बड़ा सबूत हैं। उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बावजूद सूचना आयोगों में सूचना आयुक्तों के 160 में से 38 रिक्त पदों को नहीं भरा जा सका है।

इतना ही नहीं रिक्त पदों की संख्या वर्ष 2019 की तुलना में इस साल बढ़ गयी है। चिंता की बात  ये भी है कि केन्द्रीय सूचना आयोग सहित तीन राज्यों उत्तर प्रदेश, झारखंड और गोवा में मुख्य सूचना आयुक्त का पद भी रिक्त है। पिछले साल सूचना आयुक्तों के कुल 155  में से 24 पद रिक्त थे। ये तो हाल उच्च स्तर का है। यदि जमीनी रूप से देखा जाये तो विभागों में भी महज इसकी खानापूर्ति की जा रही है।

आरटीआई के तहत जानकारी मांगने वालों की संख्या इतनी कम होने के बावजूद इसे हासिल करने में कई—कई दिन लगते हैं। यहां तक कई महकमे तो सूचना मांगने वालों को आरटीआई माफिया तक करार देते हैं। बहरहाल, आरटीआई कानून के बेहतर माहौल के लिए इन हालातों को भी गौर करना होगा। 

केवल हरियाणा और मणिपुर ही अपने सूचना आयुक्तों की संपत्ति का विवरण सार्वजनिक करते हैं। ये तमाम कारक हैं, जिन्हें अभी आम सहूलियत के लिहाज से ढलना बाकी है। इन विपरीत हालातों के बावजूद यदि देश में 3.32 करोड़ लोग आरटीआई का इस्तेमाल कर रहे हैं तो यह आंकड़े उम्मीद जगाते हैं।

एक बात और कि मान भी लिया जाये कि आरटीआई इस्तेमाल करने वालों का यह आंकड़ा बढ़ जाये तो क्या मौजूदा तंत्र खुद को इसके अनुकूल ढाल सका है। सच पूछिये तो बिल्कुल नहीं। आरटीआई कानून को प्रभावी बनाने के लिये केन्द्र एवं राज्यों के स्तर पर गठित सूचना आयोगों में खाली पड़े पद इसका बड़ा सबूत हैं। उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बावजूद सूचना आयोगों में सूचना आयुक्तों के 160 में से 38 रिक्त पदों को नहीं भरा जा सका है।

इतना ही नहीं रिक्त पदों की संख्या वर्ष 2019 की तुलना में इस साल बढ़ गयी है। चिंता की बात  ये भी है कि केन्द्रीय सूचना आयोग सहित तीन राज्यों उत्तर प्रदेश, झारखंड और गोवा में मुख्य सूचना आयुक्त का पद भी रिक्त है। पिछले साल सूचना आयुक्तों के कुल 155  में से 24 पद रिक्त थे। ये तो हाल उच्च स्तर का है। यदि जमीनी रूप से देखा जाये तो विभागों में भी महज इसकी खानापूर्ति की जा रही है।

आरटीआई के तहत जानकारी मांगने वालों की संख्या इतनी कम होने के बावजूद इसे हासिल करने में कई—कई दिन लगते हैं। यहां तक कई महकमे तो सूचना मांगने वालों को आरटीआई माफिया तक करार देते हैं। बहरहाल, आरटीआई कानून के बेहतर माहौल के लिए इन हालातों को भी गौर करना होगा। 

Related Articles

Back to top button
E-Paper