संपादकीय : हलफनामे का सच

Yogi aur SC

हाथरस कांड को सुप्रीम कोर्ट ने भयावह बताते हुए सच सामने लाने की हिमायत की है। कौन नहीं चाहेगा कि सच सामने आये। वस्तुत: इस निर्मम कांड पर सच और झूठ की इतनी परतें चढ़ गयी हैं कि आसानी से सत्यता सामने आना बहुत मुश्किल है। उत्तर प्रदेश सरकार ने अपनी ओर से जो हलफनामा दायर किया है, अगर वह सच है तो निश्चित रूप से इस प्रकरण को चिनगारी दिखाकर बड़ी साजिश रची जा रही थी। यह ठीक है कि हाथरस की बेटी के साथ अमानुषिक कृत्य किया गया, इसके लिए दोषियों को कठोरतम दंड दिया जाना चाहिए।

लेकिन इसके लिए सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इस तरह की जघन्य वारदातें पहले भी होती रही हैं और आगे बंद होंगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं ले सकता। यह मानव में दानवीय प्रवृत्ति है, जो कभी भी हावी हो सकती है। जिन्होंने यह दानवीय कृत्य किया, इसके लिए वे ही दंड के पात्र हैं। हां अगर सरकार उन्हें बचाये, संरक्षण दे, तब उस पर सवालिया निशान जरूर खड़े होते हैं।

लेकिन जिस तरह सोशल मीडिया और अन्य मंचों के माध्यम से सरकार पर प्रश्नचिह्न लगाये गये, उससे तो सरकार खुद-ब-खुद कठघरे में खड़ी हो गयी। अवाम की नजरों में सरकार पतित हो गयी। हमारा मकसद सरकार का बचाव करना या उसका महिमामंडन करना नहीं, लेकिन जबरन लगाये जा रहे धब्बों का यथार्थ जानना है। वैसे तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है और इस बारे में वह कोई भी निर्देश दे सकती है, लेकिन राज्य सरकार ने जो हलफनामा दायर किया है, अगर उस पर कोई रंग-रोगन नहीं चढ़ाया गया तो एक दूसरी तस्वीर भी सामने आ रही है। हलफनामे के मुताबित पीड़ित का अंतिम संस्कार उसके परिवार की रजामंदी से रात में ही किया गया।

उस दौरान पीड़ित के परिजन भी मौजूद रहे। अब तक प्रचार यह किया जा रहा था कि रातोंरात पीड़िता उसके परिजनों की गैर मौजूदगी में अंतिम संस्कार किया गया। विपक्षी दलों के नेता और मीडिया के लोग पीड़ित परिवार तक पहुंचने के लिए पुलिस की लाठियां तक सहन कर रहे थे। सारे प्रकरण से यही लग रहा था कि सचमुच सरकार तानाशाही कर रही है। उसकी छवि इसी तरह की बन गयी थी। हां, हलफनामा दायर करने के बाद जरूर इस पर अंकुश लगा है।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि हाथरस कांड भयावह था। भयावह मात्र इसलिए नहीं कि एक बालिका के साथ अमानुषिक कृत्य किया गया बल्कि इसके पीछे जो साजिश थी, अगर वह मूर्तरूप ले लेती तो स्थितियां बेहद जटिल हो जातीं, सरकार के लिए ही नहीं, देश के लिए भी। साजिश की जो तस्वीर सामने आ रही  है, उसमें विपक्षी दल भी मोहरे बन रहे थे।

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हलफनामे का सच क्या है, यह तो विस्तृत जांच का विषय है। सीबीआई जैसी किसी एजेंसी से ही इसकी पूरी पड़ताल करायी जा सकती है। हां, जब तक इसकी जांच पूरी न हो जाये, मीडिया पर भी कयासबाजी न करने के लिए अंकुश लगाया जाना चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग नहीं होने देना चाहिए। ये सारे निर्देश सुप्रीम कोर्ट बिना किसी दबाव के दे सकती है।

तब कोई इस पर प्रश्नचिह्न भी नहीं लगा सकता। इस पर सुनवाई अगले सप्ताह होनी है, देखना यह है कि न्यायालय हलफनामे की कितनी बातों को सच मानता है और क्या निर्देश जारी करता है।

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