संपादकीय : संयुक्त राष्ट्र और भारत

संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में शनिवार को भारत की ओर से अब तक का सबसे सख्त और प्रभावशाली संबोधन दिया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए सं.रा. महासभा से कहा कि अब जरूरी है कि इस वैश्विक संस्था का स्वरूप बदला जाए। इसके भीतर की सुधार प्रक्रियाओं में तेजी लाई जाए, भारत इसका बेसब्री से इंतजार कर रहा है। प्रधानमंत्री के संबोधन के पूर्व भारत के स्थाई प्रतिनिधि ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के एक दिन पहले के वक्तव्य का उत्तर देते हुए कहा कि अब पाकिस्तान को पोओके यानि गुलाम कश्मीर को खाली कर देना चाहिए, वह क्षेत्र हमारा है।

भारत ने स्पष्ट कहा कि जम्मू एवं कश्मीर में अन्य समस्याओं का समाधान हो चुका है, बस जिस हिस्से में पाकिस्तान ने अवैध कब्जा कर रखा है, उसे खाली कराया जाना बाकी है। कुल मिला कर इन दोनों अवसरों पर भारत की ओर से जिस मजबूती के साथ अपनी बात रखी गई, वह भारत के बढ़े हुए आत्मबल को प्रदर्शित करता है।

भारत चाहता है कि पिछले सारे लंबित मामलों का अब समाधान निकल जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में भारत को स्थाई सदस्यता देने के नाम पर बरसों से टालमटोल चल रही है। भारत जनसंख्या के लिहाज से भारत दुनिया का सबसे बड़ा और आदर्श लोकतंत्र है।

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आबादी में चीन भारत से जरूर आगे है, मगर वहां लोकतंत्र यानि जनता का शासन नहीं है। तानाशाही के तले रौदी जा रही चीनी जनता के मुकाबले भारत की जनता कहीं अधिक आजाद है, उन्मुक्त होकर अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति कर सकती है। ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों की बात छोड़िए, भारतीय शासन व्यवस्था अमेरिका से अधिक लोकतंत्रात्मक है। कुछ समय पूर्व तक अमेरिका खुद को दुनिया सबसे बड़ा लोकतंत्र बताता था, मगर वर्ष 2014 के संसदीय चुनावों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया के हर मंच पर भारत को सबसे बड़ा लोकतंत्र बताने से नहीं चूकते। इस हकीकत को अब अमेरिका भी स्वीकारने लगा है।

शनिवार के संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के प्रति भारत में जितना सम्मान है, वैसा बहुत कम देशों में देखने को मिलता है। यह वाक्य, एक तरह से उन बड़े देशों के रवैये की ओर इशारा करता है, जो संयुक्त राष्ट्र पैरों की जूती समझते आए हैं। संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों को लगभग झिझोड़ते हुए पीएम मोदी ने पूछा कि- 75 वर्ष पूर्व की परिस्थितियों में इस संस्था का गठन हुआ था, क्या यह आज की परिस्थितियों में भी प्रासंगिक है? अधिसंख्य देश इसका उत्तर नहीं कहेंगे। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि कोरोना काल में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को क्या माना जाए? इसका उत्तर भी नकारात्मक ही है। उन्होंने सदस्य देशों से आत्ममंथन को भी कहा, साथ ही विश्व शांति में अब तक निभाई गई भारत की भूमिका का भी जिक्र किया।

लद्दाख एलएसी में पिछले पांच महीने से चीन ने जो स्थिति बनाई है और भारत जिस सूझबूझ के साथ इससे निपट रहा है, दुनिया समझ चुकी है कि कौन आक्रमणकारी है और कौन शांति दूत। यही समय है, जब भारत पिछले इतिहास और वर्तमान की नीतियों के बल पर वैश्विक जगत में अपना स्थान कई पायदान ऊपर ले जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में यही किया। अब किसका लिहाज करना, जब सभी बड़े देश किसी न किसी मोर्चे पर विशुद्ध रूप से अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे हुए हैं, तब भारत तठस्थ रह कर राम झरोखे से मुजरा नहीं देख सकता। भारत को इस वैश्विक परिस्थिति का लाभ लेना ही होगा।

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