संस्कृति तू न गई मेरे मन से, कितना समझते हैं हम अपनी संस्कृति

वी.माया पत्रकार

भारतीय संस्कृति संसार की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। मध्य प्रदेश के भीमबेटका में पाए गए शैलचित्र, नर्मदा घटी में की गई खुदाई तथा कुछ अन्य नृवंशीय एवं पुरातत्वीय प्रमाणों से सिद्ध हुआ है कि भारत की भूमि आदि मानव की प्राचीनतम कर्मभूमि रही है। वेदों में भारतीय संस्कृति न सिर्फ प्राचीनता का एक प्रमाण है बल्कि वह भारतीय अध्यात्म और चिंतन की भी सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। वेदों में और वैदिक ग्रंथों में हम भारतीयों की आस्था और विश्वास आज भी उतना ही है जितना हजारों साल पहले था।

गीता और उपनिषदों के संदेश हजारों साल से हमारी प्रेरणा और क्रम का आधार रहे हैं। हिमालय में रूपकुंड के दस-बारह फिट ऊंचे हजारों मानव कंकाल भारतीय संस्कृति के बारे में अवश्य संकेत करते हैं। फिर सिंधु घाटी और मोहन जोदाड़ो की सभ्यताएं और नालंदा, तक्षशिला, बोध गया, सारनाथ, श्रावस्ती, सांची स्तूप भी तो कुछ कहते हैं। दक्षिण भारत के मंदिरों की वास्तुकला भी भारतीय संस्कृति की साक्षी रही है।

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क्या वास्तव में हम संस्कृति को सही मायनों में समझ पाये हैं या सिर्फ परिभाषित रूप में पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त कर पाये है। हम सभी संस्कृति और सभ्यता से अछूते नहीं हैं, बस फर्क इतना है कि हम संस्कृति को उसके गूढ रूप में कितना समझ पाए हैं। सर्वप्रथम संस्कृति का अर्थ समझना जरूरी है; संस्कृति शब्द का प्रयोग हम दिन-प्रतिदिन के जीवन में निरन्तर करते रहते हैं। ‘संस्कृति’ का अर्थ समाजशास्त्रीय अवधारणा के रूप में ‘सीखा हुआ व्यवहार’ होता है।

अर्थात् कोई भी व्यक्ति बचपन से अब तक जो कुछ भी सीखता है, उदाहरण के तौरे पर खाने का तरीका, बात करने का तरीका, भाषा का ज्ञान, लिखना-पढना तथा अन्य योग्यताएँ, यह संस्कृति है। हर देश की अपनी अलग संस्कृति, अलग पहचान होती है, वहां की जलवायु, वहां का मौसम, वहां के आचार विचार के आधार पर। उदाहरणत: पाश्चात्य संस्कृति और भारतीय संस्कृति दोनों ही स्ंस्कृतियों में जमीन आसमान का अंतर है।

हमारी संस्कृति और सभ्यता में जितनी लचकता, जितनी विनम्रता है, शायद ही किसी और संस्कृति में हो। किंतु आधुनिकता के इस दौर में हमारी संस्कृति पर पाश्चात्यवाद का अंधानुकरण होता जा रहा है।

फिर भी, लाख बदलना चाहो, मूल स्वरूप कभी नहीं बदलता है। आज के समय में सभ्यता और संस्कृति को एक-दूसरे का पर्याय समझा जाता है, किंतु वास्तव में दोनों ही एक—दूसरे से अलग हैं। सभ्यता का संबंध हमारे बाहरी जीवन के ढंग से होता है यथा– खान-पान, रहन-सहन, बोलचाल जबकि संस्कृति का संबंध हमारी सोच, चिंतन, और विचारधारा से होता है। सभ्यता का अनुकरण तो किया जा सकता है लेकिन संस्कृति का अनुकरण नहीं किया जा सकता है।

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भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्ध संस्कृति है। इसे विश्व की सभी संस्कृतियों की जननी माना जाता है। जीने की कला हो या आचार—विचार या फिर विज्ञान और राजनीति का क्षेत्र, भारतीय संस्कृति का सदैव विशेष स्थान रहा है। भारत की संस्कृति आदिकाल से ही अपने परंपरागत अस्तित्व के साथ अजर-अमर बनी हुई है। भारतीय संस्कृति में समायोजन की क्षमता है हमारे देश में विभिन्न संस्कृतियों के लोग आए और यहीं पर बस गए। उनकी संस्कृतियाँ भारतीय संस्कृति का अंग बन गईं। भारतीय संस्कृति की पृष्ठभूमि में मानव कल्याण की भावना निहित है। यहाँ पर जो भी काम होते हैं वो बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय की दृष्टि से ही होते हैं। हमारे देश की संस्कृति की मूल भावना ‘वसुधैव कुटुम्बकम’के पवित्र उद्देश्य पर आधारित है अर्थात सभी सुखी हों, सब निरोग हो, सबका कल्याण हो।

भारतीय संस्कृति में अध्यात्म और भौतिकता का तारतम्य : भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र आध्यात्मिकता है। भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिकता का आधार ईश्वरीय विश्वास होता है।  उनकी दृष्टि में भगवान ही इस संसार का रचयिता एवं निर्माता है। भारतीय संस्कृति के प्रमुख तत्व त्याग की वजह से मनुष्य में संतोष गुण परिपूर्ण रहता है। यहाँ पर त्याग की भावना में जन कल्याण की भावना छिपी होती है। काम में संयम भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषता होती है। भारत में विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं। वे सभी अपने-अपने धर्मों में विश्वास और निष्ठा रखते हैं और दूसरों के धर्म के प्रति सम्मान भी करते हैं। भारतीय संस्कृति में आश्रम व्यवस्था के साथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का विशिष्ट स्थान रहा है। इन्हीं ने भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता के साथ-साथ भौतिकता का एक अद्भुत समन्वय कर दिया है। शरीर नश्वर होता है, आत्मा अमर होती है, यह अमरता मोक्ष से जुडी हुई है। इस मोक्ष को पाने के लिए अर्थ और काम का पुरुषार्थ करना भी जरूरी होता है। इस तरह से भारतीय संस्कृति में धर्म और मोक्ष आध्यात्मिक संदेश एवं काम और अर्थ की भौतिक अनिवार्यता में परस्पर संबंध होता है।

अनेकता में एकता :

हमारा भारत विविधताओं का देश है फिर भी सांस्कृतिक रूप से एक इकाई के रूप में इसका अस्तित्व प्राचीन समय से ही बना हुआ है। भौगोलिक विभिन्नता के साथ इस देश में आर्थिक और सामाजिक भिन्नता भी पर्याप्त रूप से विद्यमान है। इन भिन्नताओं की वजह से ही भारत में अनेक सांस्कृतिक उपधाराएँ विकसित होकर पल्लवित और पुष्पित हुईं हैं। अनेक विभिन्नताओं के बाद भी भारत की पृथक सांस्कृतिक सत्ता रही है। हिमालय पूरे देश के गौरव का प्रतीक रहा है। गंगा, यमुना और नर्मदा जैसी नदियों की स्तुति यहाँ के लोग प्राचीनकाल से करते आ रहे हैं। राम, कृष्ण और शिव की आराधना यहाँ पर सदियों से की जाती है।

बड़ों का सम्मान : 

बड़ों के लिए आदर और श्रद्धा भारतीय संस्कृति का एक बहुत ही बड़ा सिद्धांत है। बड़े खड़े हों तो उनके सामने न बैठना, बड़ों के आने पर स्थान को छोड़ देना, उनको सबसे पहले खाना परोसना जैसी क्रियाओं को अपनी दिनचर्या में देखा जा सकता है जो हमारी संस्कृति का एक अभिन्न अंग हैं। युवा सभी बड़ों, पवित्र पुरुषों और महिलाओं का आशीर्वाद प्राप्त करने और उन्हें मान-सम्मान देने के लिए उनके चरणों को स्पर्श करते हैं। भारतीय संस्कृति का उद्देश्य मनुष्य का सामूहिक विकास है। उसमें ‘वसुधैव कटुम्बकम’और ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’के भाव सर्वत्र विद्यमान हैं।

भारतीय संस्कृति में मिलावट

भारतीय संस्कृति में सहिष्णुता समाहित है। यानि इसमें समावेश की संभावना अत्यधिक है। इस संस्कृति में कभी भी बाहरी संस्कृति के बहिष्कार की उग्रता नहीं रही। यह सहनशीलता बताती है कि भारतीय संस्कृति का दिल कितना बड़ा है। इसी का कारण है कि यहां पर अरबी, फारसी से लेकर फ्रांसिसी, ब्रितानी और दुनिया के हर कोने की संस्कृति पनप गई। इन्हीं संस्कृतियों में से कई बातें भारतीयों ने जाने-अनजाने अपना लीं। दो सौ वर्ष पूर्व की व्यावहारिक संस्कृति और आज में बहुत बड़ा फर्क आ चुका है।

ऐसे ही, विदेशों में बसे भारतीयों ने वहां की स्थानीय परंपरा को अपनाने में विलंब नहीं किया है। विदेश की धरती पर भारतीय बहुत जल्दी रच-बस जाते हैं। चीन से लेकर मलेशिया, इंडोनेशिया, कंबोडिया आदि इसके उदाहरण हैं। यही कारण है कि कुछ अपवाद देशों को छोड़ दें तो विदेशी धरती पर भारतीयों के साथ वहां की सांस्कृतिक कट्टरता क्रूरता नहीं दिखा पाती। दूसरे देश के निवासी इन्हें आसानी अपना लेते हैं।

इतना ही नहीं विदेशी लोग वहां पर भारतीयों को अपनी परंपरा निभाने से रोकते नहीं हैं। अब तो ब्रिटेन, अमेरिका आदि ने नदी/जलाशयों के किनारे शवों को जलाने की अनुमति प्रदान कर दी है। गिरमिटिया श्रमिक जहां गए वहां पर वह आज भी छोटा सा भारत बसाए हुए हैं। सूरीनाम, फिजी आदि इसके उदाहरण हैं।

इतना कमी भारतीयों में देखने को मिलती है, वह अपनी सुविधा के अनुसार विदेशी संस्कृति अपनाने से परहेज नहीं करते। यहां पर संस्कृति के रक्षक भी ऐसा करने से टोकते नहीं हैं, न उनका मार्गदर्शन करते हैं। इसी कमी के कारण त्याग की धरती भारत में उपभोक्तावाद ने अपनी जड़ें जमा लीं। बाजार में भारतीय संस्कृति से जुड़ा कोई भी उत्पाद आ जाता है तो अपनी सुविधा के लिए उसे खरीद लेते हैं। यह चीनी उत्पादों की लोप्रियता का एक बड़ा कारण रहा है। फिलहाल राष्ट्रीय चेतना जग रही है, संभव है आगे चल कर इसी जागृति के कारण भारतीय संस्कृति पर घुसपैठ पर कुछ रोक लग सकेगी। जन्म दिन पर केक काट कर मोमबत्ती बुझाने की परंपरा को भी भारतीय संस्कृति का अंग नहीं रही थी। कई अन्य परंपराओं को भारतीय समाज ने अपना लिया है जो उन्हें सुविधाजनक लगती है। राष्ट्रीय मंथन के इस दौर में इसका कोई सुलभ और सर्वमान्य समाधान अवश्य निकल जाएगा। भारतीय संस्कृति में तेजी से मिलावट नहीं होगी।

सादा जीवन उच्च विचार ने दी थी भारतीय समाज को नई ऊंचाई

भारतीय संस्कृति दुनिया की सबसे प्राचीनतम संस्कृति है। जैसे—जैसे समय बढता गया इसमें कई बदलाव भी आए है। ऐसा नहीं है कि भारत की संस्कृति सिर्फ नकारात्मक तरीके से बदली है, इसमें कई सकारात्मक बदलाव भी आये है। भारत में बोली जाने वाली छह हजार से अधिक भाषाओँ की बड़ी संख्या ने यहाँ की संस्कृति और पारंपरिक विविधता को बढ़ाया है। लेकिन दुःख की बात है कि वक्त के साथ साथ उन्हें बोलने वाले लोगों की संख्या तेजी के घट रही है।

कई बोलियां विलुप्त भी हो चुकी हैं, करीब छह सौ विलुप्ति की कगार में हैं। आज के शहरी भारतीयों को यह लगता है कि अगर कोई भारतीय नागरिक, अंग्रेजी भाषा नहीं जानता है और किसी अन्य भारतीय बोली/भाषा का उपयोग करता है तो वह किसी पिछड़े गाँव का है, असभ्य है। देखा जाये तो हिन्दी भारत की मातृ भाषा है लेकिन देश में हिन्दी से ज्यादा अंग्रेजी भाषा का चलन है। अंग्रेजी भाषा ने बड़ों के प्रति आदर का भाव खत्म करने में बड़ी भूमिका निभाई है। इसीलिए खासकर युवाओं में, आदर का भाव खत्म होते जा रहा है। जहां लोगों की बीच प्यार और सम्मान हुआ करता था आज उसकी जगह पैसों ने ले ली है।

आज भारत के लोगों को भौतिक शिक्षा तो मिल रही है, लेकिन देश आध्यात्मिक ज्ञान से दूर होता जा रहा है। भारत के लोग खुद की संस्कृति और परम्पराओं के पीछे जो वैज्ञानिक कारण है, उन्हें जानने के बजाय अन्य देशों की संस्कृति को अपना रहे हैं। योग का ही उदाहरण ले लीजिये, योग का उल्लेख भारत के प्राचीन ग्रंथों और पतंजलि योग सूत्र में किया गया है। भारत के लोगों में योग पहले उतना लोकप्रिय नहीं था, जितना कि अन्य देशों द्वारा इसे स्वीकारने के बाद हुआ है। आयुर्वेद का उपयोग भी पहले से काफी कम हो गया है जिसका प्राचीनकाल में भारत में अत्याधिक उपयोग किया जाता था। आज के भारतीय लोगों में एकल परिवार की धारणा पुष्पित-पल्लवित होने लगी है। विविधता में एकता रखने वाला हमारा देश संकीर्ण मानसिकता के चलते अब अपनी राह भटकता नजर आ रहा है। जहां दधीचि, हरीश चन्द्र, की परंपरा में गांधी, पटेल जैसे त्याग की मूर्ति जन्मे थे, अब उसी देश में स्वार्थ का बोलबाला दिखने लगा है। जाति-धर्म के नाम पर भारतीय समाजों को एक दूसरे से लड़ाया गया। वैमनस्य का जहर जो कुछ सदी पहले बोया गया, उसका असर अब तक खत्म नहीं हुआ। कई बार तो इस जख्म को कुरेद कर कुछ लोग लाभ उठा लेते हैं।

सादा जीवन, उच्च विचार, हमारी संस्कृति की परम्परा समझी जाती थी परन्तु यह भाव कहां चला गया पता ही नहीं। वर्तमान में सामाजिक बदलाव को देखकर ऐसा लगने लगा है, जिस भारतीय समाज में हम रहते हैं, वहां का वातावरण, सभ्यताएं, मर्यादाएं नैतिक मूल्य कुछ और ही हैं। ऐसे में जब हम पहनावे में उसकी खुली सोच और खुलेपन का अंधानुकरण करते हैं तो हमारे वातावरण में नग्नता दिखाई देती है। हवा में अजीब सी गंध घुल गई है जो हम भारतीयों पर विपरीत असर कर रही है।

संस्कृति का उद्देश्य मानव जीवन को सुंदर बनाना है। परन्तु पाश्चात्य संस्कृति की चमक हमें बदसूरती की तरफ ले जा रही है। पहनावे में भड़काउपन और खुलेपन की सोच के कारण स्त्री देवी के स्थान पर भोग्या बन गई। जहाँ पहले रिश्तों की अहमियत थी शादियां पूरी जिंदगी चलती थी आजकल वही रिश्ते टूटे—फूटे सामान की तरह हो गये हैं। लिव इन रिलेशनशिप का चलन चल गया है हमारे भारत में। अपराध बढ रहे हैं। हमारा दुर्भाग्य है कि हमने पहनावे में नकल कर ली पर अपनी अकल विकसित नहीं कर पाए। फैशन का दुष्प्रभाव पुरूष व स्त्री दोनों में समान रूप से है। ये हमारी संस्कृति पर कुठाराघात नहीं तो क्या है।

यदि हमें अपना अस्तित्व बनाए रखना है तो इस छद्म आधुनिकता और वास्तविकता आधुनिकता के बीच अंतर समझना होगा। आधुनिकता के नाम पर हमारी संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। क्या देश के नागरिकों का यह कर्तव्य नहीं बनता कि वो अपने देश को सही दिशा देने की कोशिश करे। अब आवश्यकता आन पड़ी है कि जब भारतवासी हमारी संस्कृति पर पड़े पाश्चात्यवाद के आवरण हटाकर दूर फेंक दें। बदलाव थोडा बहुत ठीक है किंतु पूरा—पूरा होने लगे तो ठीक नहीं। बदलाव की आँधी में बहकर इतनी दूर ना निकल जाए कि अपनी ही धरोहर को खो बैठे हैं।

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