जिनके घर शीशे के हों वो क्या नहीं करते…

jagjit joshi

जगदीश जोशी- वरिष्ठ पत्रकार

बचपन से यानि जब से खबरों को समझने लायक होश संभाला, तब से कई वर्षों तक दैनिक कांव-कांव के अलावा ‘सप्ताह की नौटंकी पढ़ा करते। इंतजार रहता था उर्मिल थपलियाल जी के नट-नटी संवाद का, जो आसान शब्दों में जोरदार कटाक्ष होता। नियमित तौर पर वह सुबह नौ-साढ़े के करीब बिना कुछ बोले अपनी कापी स्वतंत्र भारत के ‘साप्ताहिक सामग्री’ वाली डेस्क में रख जाया करते। कोशिश होती कि कंपोजिंग के लिए भेजे जाने से पहले पढ़ने का मौका मिल जाए, विजय वीर सहाय जी अक्सर दिखा देते। उस समय ‘लेड के अक्षरों से कंपोजिंग होती थी। कंपोजिंग को ग्राउंड फ्लोर में कापी चले जाने का मतलब होता था कि छपने के बाद ही पढ़ने को मिलता। हां, कभी-कभार प्रूफ रीडिंग विभाग में जा कर काली स्याही वाले प्रूफ को पढ़ लेते। शायद ऐसी दशा कई अन्य पाठकों की भी रही होगी। नवभारत टाइम्स अखबार में शरद जोशी जी का ‘प्रतिदिन’ के पढ़ने को मिलता। अब एक बार फिर से ‘विश्ववार्ता’ ने उर्मिल जी के व्यंग्य के माध्यम से पाठकों को स्वस्थ और विचारोत्तेजक हास्य देने का प्रयास किया है। टीवी का हास्य छोड़ दिया जाए तो आज के समय में व्यंग्य के लिए टॉपिक चुनना आसान नहीं रहा। पता नहीं कौन बुरा मान जाए, कौन मन में रखा ले।

पहले के व्यंग्यकार कहा करते कि किसी मंत्री-अधिकारी पर व्यंग्य लिखने पर वह बुरा नहीं मानते। बल्कि उसमें दर्शाई गईं कमियों को दुरुस्त करने का प्रयत्न करते। मिलने पर बड़े प्रसन्न हो कर उस बात का उल्लेख कर देते। लेकिन अब, वैसे हालात कतई नहीं कहे जा सकते। वाकई समय बदला है, कई बार खुद ही कई राजनीतिज्ञ ऐसा कर देते हैं कि जनता उसे ‘मजाक’ समझ कर भूल जाना चाहती है। नेताओं को अपने भाषण में ताली पिटवाने का शौक रहा है, आज भी बदस्तूर जारी है। इस चक्कर में वह क्या न बोल गए, इसका अंदाज खुद उसे नहीं रहता। ‘रौ’ में आ जाने के बाद शब्दों और तथ्यों का लिहाज ही नहीं रहता। वादे-आश्वासनों की तो पूछिए नहीं। कोई भी वादा किया जा सकता है, जमीन, आसमान, समुद्र किसी से परहेज नहीं। यहां तक कि चंद्रमा तक में आवास बनाने का वादा हो सकता है। नौकरी और रोजगार देने की बात आई तो लाख क्या करोड़ का आकड़ा कम है।

सोशल मीडिया के इस दौर में कुछ भी बात छुपती नहीं। देर-सबेर सामने आ ही जाती है। हर हाथ में एक जासूसी कैमरा है, हर दिमाग में एक रिकॉर्डर। वो चाहे ऑडियो रिकॉर्डर हो या वीडियो। कई बार तो लगता है कि सोशल मीडिया न होता तो अनगिनत हकीकतें बाहर निकल ही नहीं पातीं। कितने सफेदपोश हरीशचंद के वंशजों के रूप में अवतारित घोषित कर दिए जाते। हालांकि इस दौर में भी सच्चाई छुपाने के काफी इनोवेशन भी किए जा रहे हैं मगर सोशल मीडिया हैंडलर हैं कि अय्यरों की तरह लगे रहते हैं। तू डाल-डाल में पात-पात की तर्ज पर। सोशल मीडिया के अवतरण के पहले तो ‘मुक्त कंठ’ से किए गए भाषण चल जाते थे। अब तो कुछ लोग तुरंत ही गूगल करने लगते हैं, गलती पकड़ लेते हैं। शुरू हो जाता है ट्रोल करने का सिलसिला, जो बाद में गाली-गलौंज में जा कर थमता है।

यह भी देखने में आया है कि राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र सर्वाधिक उपेक्षित दस्तावेज हुआ करते हैं। उसका कितना प्रतिशत कार्य रूप में बदल पाया यह कहना ‘यक्षप्रश्न’ की तरह है। इसलिए हर राजनीतिक दल में कुछ लोगों का काम ही घोषणा पत्र बनाना होता है, यह चिंतक मंडल होता है। कहीं-कहीं निर्देशक मंडल भी हो सकता है। समय-समय पर पार्टी को किसी खास विचारधारा वाला बताने के लिए इनको ‘धो पोंछ’ कर आगे किया जाता है। बाकी समय यह ठंडे बस्ते में पड़े रहते हैं। सरकार बन जाने पर घोषणा पत्र को लागू करने की नैतिक जिम्मेदारी वालों से इसका कोई वास्ता नहीं होता। पार्टी के दो-एक बड़े नेताओं को छोड़ कर अन्य नेता तो इसकी प्रस्तावना तक नहीं पढ़ते होंगे। ऐसे में जब कोई राजनीतिक दल दूसरी पार्टी से अपना घोषणा पत्र लागू करने को कहता है, तो लगता है ‘छलनी अब सूप’ को सलाह दे रही है।

जनता को अब तथ्यों की हेराफेरी के आधार पर बरगलाया नहीं जा सकता। यह घिसा-पिटा फार्मूला ‘इस्टमेन कलर’ के दौर का हो चुका है। समझते वह भी हैं, लेकिन जब-तक सही फार्मूला हाथ नहीं लगेगा, तब तक वह पुराने को छोड़ेंगे नहीं। हां, एक कहावत है, राजनीतिज्ञ ‘मौसम विज्ञानी’ होते हैं। इसीलिए कुछ राजनीतिज्ञों ने नया तरीका इजाद कर लिया है। कुछ ने इस दिशा में ‘अनुसंधान’ टीमों को जुटा दिया है। कुछ ने अपनी बड़ी लकीर खींच कर खुद को छुपा रुस्तम साबित कर दिया है। जात-पांत और धरम-मजहब के दौर में भी सोशल इंजीनियरिंग के आगे का सूत्र खोज लिए है। कुदरत का नियम है परिवर्तन। बॉलीवुड में एक ही फार्मूले पर कई फिल्में हिट नहीं हो पातीं। उन्हें अब ‘बायोपिक’ ज्यादा रास आ रहे हैं, जो बायोपिक नहीं बना पा रहे वह मिर्जापुर जैसी वेब सिरीज बना रहे हैं। यानि कि हकीकत के करीब हो रहे हैं। बदलना सबको है, नया कुछ कर दिखाना है। दूसरे को छोटा कहने के बजाय अपनी व्यावहारिक कार्ययोजना सामने लाएंगे तो जरूर हिट होंगे। दूसरों पर आरोप लगाने चाहिए सोच लें कि ऐसे आरोप खुद न झेल सकेंगें क्या? आधुनिक सूक्त वाक्य है- जिनके खुद के घर शीशे के होते हैं, वह दूसरों पर पत्थर नहीं मारा करते। l

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