उपवास यानी शरीरिक ऊर्जा का संतुलन

नवीन कुमार घोषाल

नवरात्र शुरू होने को है, आदिशक्ति मां दुर्गा की उपासना में हर सनातनी रमने वाला है। इन पवित्र दिनों में अधिकतर लोग व्रत या उपवास रखते हैं। कई लोग अपनी कुछ ‘लतों’ को इस अवधि में छोड़ देते हैं। यहां तक कि मांस-अंडा भी ग्रहण नहीं करते। ऐसे लोगों को अकसर कहते सुना जाता है, नवरात्र चल रहे हैं, नवमी अमुक तारीख को है, उसके बाद बैठेंगे। कुछ लोग दाढ़ी तक नहीं बनाते, बाल नहीं कटवाते। कुछ लोगों को कहते सुना होगा- डायबिटिक हैं, पहली और अष्टमी का ही व्रत रखते हैं। कई लोग, खासकर कई महिलाएं तो पूरे नौ दिनों तक उपवास रहती हैं। इस पूरी अवधि में वे अन्न न ग्रहण कर फलाहार ही लेते हैं।

बात उपवास की आयी तो महात्मा गांधी ने भी उपवास की महिमा और उसके लाभ के बारे में विस्तार से बताया है। वैसे भी हमारी सनातन परंपरा में उपवास का खासा महत्व है। विभिन्न अवसरों के लिए उपवास की व्यवस्था की गई है। एकादशी हो, पूर्णिमा हो या फिर अन्य पर्व, सभी में अलग-अलग तरह के उपवासों की व्यवस्था की गई है। इन सभी उपवासों में एकादशी के उपवास का महत्व सबसे ज्यादा बताया गया है।

निर्जला एकादशी, आंवला एकादशी का उपवास रखा जाता है। देखा जाए तो हमारी सनातन परंपरा में जो भी नियम या व्यवस्थाएं दी गई हैं, उनका मूल आधार पूरी तरह से विज्ञान ही है। माना जाता है, ऋषि-मुनियों ने कई वर्षों के शोध-अनुसंधान के बाद इन परंपराओं को अपनी स्वीकृति दी होगी। पूर्व वैदिक काल में भोजन को लेकर उतनी जानकारी नहीं रही होगी, इसलिए उपवास का विशेष जिक्र नहीं मिलता। ज्यों-ज्यों मानव सभ्यता आगे बढ़ी, वैदिक काल आया, जीवनशैली में बदलाव आना शुरू हुआ। उन्हीं में से एक उपवास अनुष्ठान भी है। उपनिषद् काल में इसके महत्व को और परखा गया।

सनातन धर्म ही नहीं, हर धर्म में किसी न किसी बहाने से व्रत या उपवास रखने का विधान है। इस्लाम में तो पवित्र रमजान का पूरा महीना ही रोजों के लिए आरक्षित रहता है। इस काल में मुस्लिम धर्मावलंबी पूरे माह सुबह सहरी के बाद शाम को इफ्तार तक पूरे दिन में पानी पीना तो दूर, थूक तक निगलते नहीं। इफ्तार और सहरी के समय ही भोज्य पदार्थ के रूप में ऊर्जा प्रदान करने वाला भोजन (जैसे खजूर, चना, दही आदि) लेते हैं। साल में करीब तीस दिन ऐसी दिनचर्या निभानी होती है। वहीं ईसाई धर्म में बाइबिल इन वचनों में स्पष्ट दर्शाता हैं कि परमेश्वर के धार्मिक कार्य को पूरा करने के लिए उपवास भी जरूरी हैं और यीशु के शिष्यों ने भी उपवास का पालन किया।

… यीशु जब तक अपने चेलों के साथ रहे, तब तक चेलों ने उपवास नहीं किया, पर यीशु के, चेलों से अलग होने के बाद मूसा की व्यवस्था के अनुसार चेले उपवास करते रहे। उपवास को लेकर विशेषकर करके बाइबल में ऐसा लिखा है- जब तुम उपवास करो, तो कपटियों की तरह तुम्हारे मुंह पर उदासी न छाई रहे, क्योंकि वे अपना मुंह बनाए रहते हैं, ताकि लोग उन्हें उपवासी जानें। मैं तुम से सच कहता हूं, कि वे अपना प्रतिफल पा चुके। परन्तु जब तू उपवास करे तो अपने सिर पर तेल मल और मुंह धो। ताकि लोग नहीं परन्तु तेरा पिता जो गुप्त में है, तुझे उपवासी जाने। इस दशा में तेरा पिता जो गुप्त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा। (मत्ती  6:16-18)। इसका मतलब यह है कि आप मनुष्यों को दिखाने के लिए उपवास और प्रार्थना न करें। इससे आपको कोई प्रतिफल नहीं मिलेगा। पहले तो ये उपवास परमेश्वर को समर्पित हो और दूसरा यह उपवास एक मकसद, एक उद्देश्य के साथ हो।

हालांकि सिख धर्म में उपवास अनिवार्य नहीं है, उनका मानना ​​है कि वे प्रार्थना और चिंतन से भगवान के करीब हो सकते हैं। इसी तरह बौद्ध धर्म में तथागत‌् बुद्ध ने तत्कालीन अंधविश्वास और अंध रूढ़ि-मान्यताओं पर प्रहार करके अपने भिक्खु संघ को और उपासक-उपासिकाओं को अंधश्रद्धा मुक्त किया। उन्होंने कहा कि काया, वाचा, मन (कार्य या शरीरिक क्रिया, वचन और मतिष्क) से बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का उपोसथ मार्ग बतलाया। इस ‘उपोसथ’ को हम जितनी ईमानदारी और निष्ठा से निभायेगें, उतनी ही हमें व्यक्तिगत स्तर और सामाजिक स्तर पर शारीरिक और मानसिक सुख-शांति का लाभ प्राप्त हो सकेगा। इसलिए बौद्धों में उपोसथ किया जाता हैं, उपवास नहीं। उपोसथ में संयम है और उपवास में भी संयम। इसलिए दोनों की प्रक्रिया भिन्न जरूर है मगर उद्देश्य एक है, वह है- शुद्धि, शारीरिक और मानसिक शुद्धि।

अब बात करते हैं विज्ञान की। आयुर्वेद समेत दूसरी सभी चिकित्सा पद्धतियों में उपवास यानी पेट को खाली रखने की प्रथा रही है। हालांकि हर बीमारी का इलाज उपवास नहीं होता, लेकिन यह अधिसंख्य बीमारियों में कारगर रहता है। दरअसल उपवास का धार्मिक अर्थ न ग्रहण करते हुए इसका चिकित्सकीय रूप समझना चाहिए। पेट को खाली रखने का ही अर्थ उपवास है। आयुर्वेद में बीमारी को दूर करने के लिए शरीर के विषैले तत्वों को दूर करने की बात कही जाती है और उपवास करने से इन्हें शरीर से निकाला जा सकता है। इसीलिए ‘लंघन्‌म सर्वोत्तम औषधम्’ यानी उपवास को सर्वश्रेष्ठ औषधि माना जाता है। ऐलोपैथी चिकित्सा विज्ञान में भी उपवास के लाभ बताये गये हैं। केजीएमयू के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. आर.बी. लाल बताते हैं कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति में भी उपवास के लिए कहा जाता है। सप्ताह में एक दिन पेट को आराम देने के लिए काफी हल्का-फुल्का भोजन ही लेना चाहिए। उनका कहना है कि उपवास शरीर के सिस्टम को साफ करता है, स्वास्थ्य बेहतर होता है। नींद का चक्र सुधरता है, पाचन तंत्र को थोड़ा आराम मिलने से शारीरिक प्रणालियां संतुलित हो जाती हैं, मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है और साथ ही फायदेमंद आहार और शारीरिक पोषण तय करने संबंधी जानकारी मिलती है।

कुल मिलाकर उपवास के अनगिनत फायदे हैं। उपवास जितना लंबा होगा शरीर की ऊर्जा उतनी ही अधिक बढ़ेगी। कुछ लोग उपवास से पहले अत्यधिक मानसिक दबाव में आ जाते हैं। सुबह से ही अन्न छोड़ कर मेवे और कुट्टू आदि के पकवान बना कर सेवन करने लगते हैं कि सामान्य दिनों के मुकाबले अधिक कैलोरी ग्रहण कर लेते हैं। ऐसा उपवास भी जब शरीर के लिए फायदेमंद नहीं है तो देवी-देवता कैसे खुश होंगे। l

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