पुलिस की दुविधा

M C Diwedi
महेश चंद्र द्विवेदी- पूर्व डीजीपी यूपी

यह सही है कि अन्य विभागों की भांति पुलिस विभाग में भी भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं तथा कतिपय पुलिसजन सामान्य व्यक्ति से अवांछनीय व्यवहार करते हैं। अत: पुलिस में सुधार की आवश्यकता है। परंतु पुलिस सुधार से सम्बंधित किसी योजना की सफलता के लिये कर्तव्यनिष्ठ पुलिसजन द्वारा किये जाने वाले कार्य के बीच भी आने वाली कतिपय दुविधाओं पर विचार करना अपरिहार्य है। पुलिस सुधार के विषय में बात करने वाले व्यक्ति प्राय: एक उलझे हुए तथ्य के विषय में मूक रहते हैं- न्यायिक प्रक्रिया की बाध्यताओं एवं समाजिक सुरक्षा की आवश्यकताओं में विरोधाभास। इस विरोधाभास के कारण पुलिसिंग के अधिकांश प्रकरणों में निर्णय लेते समय पुलिस अधिकारी की दुविधाग्रस्त हो जाने की मजबूरी होती है। प्राय: उसके सामने यह प्रश्न खड़ा हो जाता है कि वह कानून के अनुसार कार्य करे अथवा सामाजिक हित के अनुसार।

थाने पर की जाने वाली पुलिस सम्बंधी समस्त कार्यवाही को निष्पक्ष एवं विधिसम्मत रखने के लिये थाने के दफ़्तर में एक रोजनामचा आम (दैनिक डायरी) रखा जाता है, जिसमें वहां के पुलिसजनों के पुलिस सम्बंधी समस्त कार्यों का उल्लेख कर दिये जाने का नियम है। परंतु वस्तुस्थिति यह है कि कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी को भी इस रोजऩामचा में यदा-कदा हेरा-फेरी करनी पड़ती है। यदि सब कुछ यथावत रोजऩामचा में लिख दिया जाये, तो विवेचना, अभियोजन एवं शांति-व्यवस्था के अनेक प्रकरणों में सफलता मिलना कठिन हो जाये और कुछ पुलिसजनों को अनावश्यक दंड मिलने की स्थिति उत्पन्न हो जाये।

पुलिस के कार्यों की सफलता का मापक उस स्पष्टता से परिभाषित नहीं हो सकता है, जिससे किसी अभियंता, डाक्टर या तहसीलदार के कार्य का होता है। सडक़ की गुणवत्ता जांचकर अभियंता की, मरीज़ों को ठीक कर देने से डाक्टर की और ज़मीन का सही रिकार्ड रखने से तहसीलदार की सफलता स्पष्ट रूप से आंकी जा सकती है, परंतु पुलिस कार्य में सफलता का ऐसा स्पष्ट मापक सम्भव नहीं है। किसी थाना क्षेत्र में किसी थानेदार की नियुक्ति की अवधि में अपराधों का कम होना अथवा अधिक अपराधियों का दंडित हो जाना भी केवल उसकी कार्यक्षमता मात्र पर निर्भर नहीं करता है, वरन अनेक अन्य परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।

पुलिस का संवैधानिक दायित्व है कि विवेचना एवं अभियोजन में समस्त नियम-कानून का पालन करते रहना, परंतु सामाजिक दायित्व है अपराधियों को भयभीत व नियंत्रण में रखकर जनसामान्य को सुरक्षा प्रदान करना। व्यवहारिक रूप में इन दोनों दायित्वों के एक साथ सफलतापूर्वक निर्वहन में पुलिस को गम्भीर विरोधाभास का सामना करना पड़ता है। अत: पुलिस अधिकारी के दैनिक कार्य में कदम-कदम पर दुविधा सामने आती है। पुलिस द्वारा अपराधों की रोकथाम पर विचार करें, तो तथ्य यह है कि प्रत्येक प्रकरण में कानून के अनुसार कार्यवाही कर देने से अपराधियों पर नियंत्रण सम्भव नहीं है। अनेक नये छोटे-मोटे अपराधी पुलिस द्वारा समझा कर, भयभीत कर अथवा हल्की प्रताडऩा देकर सुधारे जा सकते हैं, जबकि उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही कर देने से उनके बड़े अपराधी बन जाने की सम्भावना अधिक रहती है। दूसरी ओर मंझे हुए अपराधी को यदि पुलिस येन-केन प्रकारेण (विधिसम्मत अथवा विधि-इतर उपायों से) जेल में बंद न रखे अथवा भयभीत न रखे, तो वे अपने विरुद्ध गवाहों को डरा धमकाकर मुकदमो में बइज़्ज़त बरी होते रहते हैं और डान बन जाते हैं।  

अपराधों की विवेचना के प्रकरणों में कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी की दुविधा का प्रारम्भ हो जाता है अपराध से पीडि़त किसी व्यक्ति द्वारा एफ़.आई.आर. लिखाने हेतु थाने पर आने पर ही-

1. विधि के प्राविधान के अनुसार थानाध्यक्ष को प्रथम सूचना देने वाले वादी के कथनानुसार एफ़आईआर यथावत लिख लेनी चाहिये। परंतु हम जानते हैं कि अधिकतर घरों में रात्रि में घटित चोरी, डकैती, छिनैती आदि की घटनाओं के समय कोई प्रकाश नहीं होता है, परंतु एफ़आईआर में प्रकाश न होने की बात लिख देने पर कार्यवाही शिनाख्त (आइडेंटीफिक़ेशन परेड) में गवाहों द्वारा अपराधी के सही पहिचान के लिये जाने पर भी न्यायालय उसे संदेह का लाभ देकर बरी कर देते हैं। अत: थानाध्यक्ष के समक्ष दुविधा उत्पन्न होती है कि विधि के अनुसार एफ़आईआर में घर में अंधेरा होने की बात लिखे अथवा विधिसम्मत न होते हुए भी एफ़आईआर में घर में ढिबरी, लालटेन या बिजली जलती हुई होने की बात जोड़ दे।

2. अनेक वादी प्राय: फस्र्ट इंफारमेशन रिपोर्ट में वास्तविक अपराधियों के अलावा अपने शत्रुओं को भी अभियुक्त बनाना चाहते हैं। यदि थानाध्यक्ष वादी के बताये अनुसार एफ़आईआर नहीं लिखता है, तो कानून का उल्लंघन है और यदि वादी के अनुसार लिख देता है, तो उसके निर्दोष शत्रुओं को अनावश्यक लम्बी कानूनी प्रक्रिया में फंसा देता है, जिसमें उन्हें कारावास का दंड भी मिल सकता है। इससे उन निर्दोष व्यक्तियों में पुलिस के प्रति दुर्भाव भी पैदा होता है। अत: थानाध्यक्ष के समक्ष विधिक प्राविधान एवं सामाजिक हित के बीच दुविधा उत्पन्न होती है। अनेक कर्तव्यनिष्ठ थानाध्यक्ष निर्दोषों को दंड से बचाने हेतु एफ़आईआर में वादी के बताये अनुसार अभियुक्तों की नामज़दगी नहीं करते हैं वरन जहां तक सम्भव हो पाता है, वास्तविकता का पता लगा लेने के बाद केवल असली अपराधियों को नामज़द करते हैं।

3. प्राय: एफ़आईआर में वादी असली अपराधियों के साथ कुछ निरपराधों को अभियुक्तबना देते हैं। निरपराधों को छोडक़र केवल असली अपराधियों के विरुद्ध आरोप-पत्र प्रेषित करने पर कचहरी प्राय: बचाव के वकील का यह तर्क मान लेती है कि वादी व उसके गवाह अविश्वसनीय हैं और संदेह का लाभ देकर असली अपराधियों को भी छोड़ देती है। ऐसे में विवेचक के सामने यह दुविधा खड़ी होती है कि निर्दोष अभियुक्तों को छोडक़र केवल असली अपराधियों के विरुद्ध ही आरोप-पत्र लगाये जिससे निरपराधियों को दंड न भुगतना पड़े, अथवा सभी नामित अभियुक्तों के विरुद्ध आरोप-पत्र लागा दे जिससे असली अपराधियों को दंड मिल जाये चाहे साथ में निर्दोष अभियुक्त भी दंडित हो जायें। इस पहेली का हल बड़ा जटिल है। ऐसी गवाही, जिससे निर्दोषों को छोडक़र केवल असली अपराधियों के विरुद्ध आरोप-पत्र प्रेषित किया जा सके, मिलना बड़ा कठिन होता है और ऐसा करने से विवेचक के विरुद्ध भ्रष्टाचार या पक्षपात का झूठा आरोप आसानी से लगा दिया जाता है, जिससे स्वयं के बचाव में उसे बड़ी कठिनाई होती है।

4.पूछताछ के दौरान थर्ड डिग्री का प्रयोग कानूनन अपराध है, परंतु जनसुरक्षा के प्रति समर्पित पुलिस अधिकारी उससे पूर्णत: परहेज़ नहीं कर सकता है, उदाहरणार्थ, यदि आतंकवादियों ने जगह-जगह टाइम बौम्ब लगा रखा हो अथवा बलात्कार के उद्देश्य से महिला का अपहरण कर लिया हो, तब संदिग्ध व्यक्ति से उन बौम्ब्स की अथवा अपहृत की लोकेशन के विषय में पूछने में थर्ड डिग्री से परहेज़ करने वाला पुलिस अधिकारी तो समाज को गम्भीर खतरे में डाल सकता है।

अपराधियों के अभियोजन में पुलिस के समक्ष एक अनोखी सैद्धांतिक दुविधा उत्पन्न होती है। कानून के अनुसार पुलिस का कर्तव्य है कि न्यायालय के समक्ष सभी सही साक्षी और सही तथ्य प्रस्तुत करे जिससे न्यायालय सही निर्णय पर पहुंच सके। बचाव के वकील को ऐसी कानूनी बाध्यता नहीं है। मैंने एक दिन चेयरमैन, बार काउंसिल आफ़ इंडिया से यह प्रश्न पूछा था कि क्या अपराध की घटना का सही विवरण तथा यह तथ्य कि उसका मुवक्किल ही वास्तविक अपराधी है, जानते हुए बचाव का वकील कानूनन बाध्य नहीं है कि वह वे सभी तथ्य यथावत न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करे? उन्होंने उत्तर दिया था कि नियम के अनुसार बचाव के वकील का कर्तव्य होता है कि वह अपने मुवक्किल को दंड से बरी कराने का प्रयत्न करे, अत: अभियुक्त को दंडित कराने वाले किसी सत्य को न्यायालय को बताना उसका फज़ऱ् नहीं है। इस तरह कानून अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष के साथ समान नियमों वाला व्यवहार नहीं करता है। अत: पुलिस के समक्ष यह दुविधा उत्पन्न होती है कि नियमो में बंधे रहकर अपराधियों को बरी होने दे, अथवा उन्हें सज़ा दिलाने के लिये नियमों को तोड़े। यह सच है कि मजबूरन अधिकांश अभियोजक बाद वाला रास्ता अपनाते हैं।

शांति-व्यवस्था की समस्या उपस्थित होने पर कानूनी प्रक्रिया का पालन उतना महत्वपूर्ण नहीं रह जाता है जितना न्यूनतम जन-धन की हानि से समस्या का शीघ्र सुलझ जाना। और यह काम हिकमतअमली से सम्भव होता है, केवल कानूनी कार्यवाही से नहीं। अनेक प्रकरणों में शीघ्र शांति की बहाली हेतु पुलिस को कानून के बजाय जनसैलाब की संतुष्टि के अनुसार कार्यवाही करनी पड़ती है, चाहे वह विधि का उल्लंघन ही क्यों न हो।

पुलिस अधिकारी के कार्य की गुणवत्ता का आकलन भी दुविधा का विषय होता है- किसी थानाध्यक्ष के कार्यकाल में किसी थाने में अपराध कम होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि उसका अपराधियों पर नियन्त्रण अच्छा रहा, क्योंकि अपराध कम होने का कारण यह भी हो सकता है कि उस कार्यकाल में अपराधी अन्यत्र व्यस्त रहे हों अथवा पिछले थानाध्य्क्ष द्वारा बंदी बनाये जाने के कारण कारागर में बंद रहे हों। अधिक मुकदमों में अपराधियों को दंड मिल जाने मात्र से भी किसी थानाध्यक्ष के प्रभावी होने का आकलन नहीं हो सकता है क्योंकि सज़ा मिलना या न मिलना पिछले विवेचकों द्वारा की गई विवेचना की गुणवत्ता तथा जज के ‘कन्विक्टिंग अथवा ऐक्विटिंगनेचर’ के होने का परिणाम भी होता है। इस प्रकार उच्चाधिकारियों को थानाध्यक्ष के कार्य की गुणवत्ता का आकलन करने में भी बड़ी दुविधाजनक स्थिति का सामना करना पड़ता है।

पुलिस कार्य में दुविधा का एक महत्वपूर्ण जनक अंग्रेज़ों द्वारा बनाया कानून है। ब्रिटेन में वर्तमान स्वरूप के पुलिस संगठन की स्थापना सन 1829 में हुई थी और भारत में अंग्रेज़ों द्वारा ही सन 1861 में हुई थी। अंग्रेज़ों ने अपनी पुलिस हेतु ऐसे नियम-कानून  बनाये जिससे जनता का पुलिस में विश्वास स्थापित हो। उन्हीं अंग्रेज़ों द्वारा भारत के लिये अलग प्रकार के कानून बनाये गये जिनका मूल उद्देश्य पुलिस पर अविश्वास स्थापित करना था। उदाहरणार्थ,

1.ब्रिटेन की व्यवस्था में पुलिस के कार्य का पर्यवेक्षण केवल उच्चतर पुलिस अधिकारी करते हैं, जब कि उन्हीं अंग्रेज़ों द्वारा भारत में स्थापित व्यवस्था में उनके ऊपर जि़ला मजिस्ट्रेट व अन्य मजिस्ट्रेट भी करते हैं। इससे जनमानस में पुलिस अधिकारियों पर विश्वास का भाव स्थापित नहीं होता था। ब्रिटेन में जि़ला मजिस्ट्रेट नाम का अथवा पुलिस पर बाहरी हस्तक्षेप के अधिकार वाला कोई पद ही नहीं है।

2.ब्रिटेन के कानून के अनुसर किसी अपराध की विवेचना करने वाला पुलिस अधिकारी गवाहों का बयान लिखकर उस पर गवाह के हस्ताक्षर कराता है, जब कि भारत के कानून में विवेचक को किसी गवाह के बयान लिखकर उस पर गवाह के हस्ताक्षर कराने की मनाही है।

3.ब्रिटेन में किसी पुलिस वाले के समक्ष किसी अभियुक्त द्वारा की गई अपराध की संस्वीकृति (कन्फ़ेशन) को अभियोजन के दौरान न्यायालय में विचारार्थ प्रस्तुत किया जा सकता है, परंतु भारत में न केवल पुलिस अधिकारी के समक्ष किये कनफ़ेशन को न्यायालय में प्रस्तुत किये जाने की मनाही है, वरन पुलिस वाले की उपस्थिति में मजिस्ट्रेट द्वारा लिखा गया कनफ़ेशन भी विचार में लेने हेतु मान्य नहीं है।

अंग्रेज़ों द्वारा बनाये कानून में भारत की पुलिस को जानबूझकर पूर्णत: अविश्वसनीय रखने का प्रयास किया गया था, जिससे उसमें और जनता में अविश्वास की खाई बनी रहे। दुर्भाग्यवश हम आजतक उन्हीं नियम और कानून को ढो रहे हैं।   

ऐसे कानून का पालन कर दुर्दांत अपराधियों को न्यायालय से दंड दिला पाना पुलिस के लिये अत्यंत कठिन हो जाता है। अत: एन्काउंटर का ड्रामा कर उन्हें मार देने वाले पुलिस अधिकारी प्राय: अधिक जनप्रिय हो जाते हैं क्योंकि वे समाज को सुरक्षा देते हैं, जब कि कानून की किताब से चलने वाले पुलिस अधिकारी प्राय: अप्रभावी अधिकारी रह जाते हैं। यह कुछ उसी तरह है जैसे मानवीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रत्येक प्रकार के कानून को ताक पर रखकर ओसामा बिन लादेन को मार देने वाले अमेरिका की सर्वत्र प्रशंसा हुई थी।

किसी प्रकरण में निर्णय लेते समय अधिकांश पुलिस अधिकारी दुविधाग्रस्त रहने को बाध्य होते हैं, और उनके कार्य का आकलन करने वाली जनता और उच्च पुलिस अधिकारी भी इस दुविधा से अछूते नहीं रह पाते हैं। पुलिस सुधार सम्बंधी कोई आयोग अथवा आलोचक इन दुविधाओं का निराकरण नहीं कर पाया है। मजबूरन प्रेक्टिकल टाइप के पुलिस अधिकारी मातहतों के कार्य की गुणवत्ता एक नई तराजू से नापते हैं- कार्य ‘गुड फेथ’ में जनहित हेतु किया गया हो, तो नियम-कानून पर ध्यान देना अनावश्यक है।

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