घसीटे-मसीटे का स्वांग

Urmil Kumar Thapliyal

उर्मिल कुमार थपलियाल

घसीटा- तसलीम लुढ़काता हूं जनाब संभालिये।

मसीटा- लुढ़काइये मगर जरा संभल कर।

घसीटा- बेफिक्र रहिये। हम शायर हैं।

मसीटा- तो हम भी मायर हैं।

घसीटा- ये मायर क्या होता है।

मसीटा- वही जो शायर होता है।

घसीटा- शायर तो शायरी करता है।

मसीटा- मायर भी मायरी करता है।

घसीटा- अमा, शायर वो जो शेर कहे।

मसीटा- अबे, मायर वो जो मेर कहे।

घसीटा- शायर तो कहता है कि रफ्तारे तो शरमिंदा कंद कुबक दरीरा।

मसीटा- मायर भी कहता है कि- दफ्तरे तो मरमिंदा कंद मुबक मरीरा।

घसीटा- अबे ये मुबक क्या होता है।

मसीटा- वही जो कुबक होता है।

घसीटा- अजी, कुबक तो एक जनावर है जो कुबकिस्तान में रहता है।

मसीटा- तो मुबक भी एक जनावर है जो मुबकिस्तान में रहता है।

घसीटा- अबे तू, किस खेत की मूली है।

मसीटा- अबे, जिस खेत की तू गाजर है।

घसीटा- ये क्या बकवास है। क्या बकता है बकबक।

मसीटा- और तुम्हारे ये कौन से अल्फाज हैं किस लफ्ज से मुश्तक।

घसीटा- बमचक, बमचक, चमचम चकाचक तू क्या समझेगा दो कौड़ी के अहमक।

मसीटा- अरे तेरी बगल में कौन खड़ी है?

घसीटा- ये तेरी बीबी नहीं है। मेरी है।

मसीटा- तभी इतनी खूबसूरत है।

औरत- मुझे खट्टे अंगूर बहुत पसंद हैं।

घसीटा- मगर ये लोमड़ी नहीं है।

मसीटा- मुझे पता है ये क्या है।

घसीटा- कैसे पता।

मसीटा- एक दिन मुझसे कह रही थी कि- परे हट बुड्ढे। पराई बकरी पर नजर नहीं रखते।

घसीटा- बिल्कुल ठीक कह रही थी। तेरा और उसका भला क्या मुकाबला।

मसीटा- क्यूं

घसीटा- अबे तू मुर्गा है और वो बकरी।

मसीटा- तो फर्क क्या है। कटना तो दोनों की तकदीर में लिखा है।

घसीटा- काफी हो गया। अब तू फूट ले।

मसीटा- कैसे फूट

घसीटा- जैसे मुंहासा फूटता है बे।

(नक्कारा खाए पिए पेट की तरह बजता है) l

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