हम भी मुंह में जबान रखते हैं

Ashish

नजर के सामने / वरिष्ठ पत्रकार आशीष बाजपेयी

पुलिस वालों की जिंदगी लोगों को बड़ी रहस्यमय लगती है। ऊपर से चाहे गाली आये या आदेश- जी सर! जयहिंद सर! के अलावा मुंह से कुछ भी और निकला कि समझो आफत। लाइन हाजिरी, निलंबन या ट्रांसफर। फरियादी के सामने जरा सी जबान फिसली कि ऑडियो-वीडियो वायरल। हम सुबह से शाम तक कितनी बार ‘मादर-फादर’ सुनते हैं, कोई नहीं पूछता। हमारी खीझ में भी निकली गालियों का हिसाब रखा जाता है। कहां से लायें मानवीय चेहरा?

सही कहा भाई!

नथुनिया पे गोली मारे, वाली छवि से आज भी बाहर नहीं निकल सकी है पुलिस। ये बड़े वाले क्या जानें हमारे दिल की।

जब देश ही चोरों की मंडी है तो किस-किस को दो। आज ईमानदारी से थाना चलाने का खर्च 30,000 से ऊपर आता है। बजट कितना है? पेशी पर जाने का खर्च अलग से। कोई बड़ा वाला सामान (सीनियर का गेस्ट) आ जाए तो उसे वेलकम ड्रिंक किसकी टेंट से सर्व करें। खाने-पीने, गाड़ी-घोड़ा का इंतजाम कहां से करेंगे। गाली अलग से सुनते हैं- साले, लूट मचा रखी है। अरे भाई, किसके लिए? अधिकारी कोई सुधार चाहता नहीं। प्रकाश सिंह या खेमका जैसे कितने मिलेंगे? या कहीं पागल खाने में मिलेंगे।

यार, तूने ‘टच’ कर दिया। बराबर बोलता है। यहां हराम की कमाई खाओ, तो सब बोलते हैं-देवता हैं। जरा-सी ईमानदारी की पेंग भरी नहीं कि ‘छिनरे’ तक के आरोप लग जाते हैं। क्या करें। घर में भी सफाई देनी पड़ती है। बच्चे भी घूरकर देखने लगते हैं।

क्षमा कीजिए पाठकों! दरअसल, किसी पुलिसिया मित्र ने गलती से अपनों के भड़ासिया ग्रुप में जोड़ लिया है। जब तक ये अपनी गलती का अहसास कर एक परलोकी प्राणी पत्रकार को इस ग्रुप से स्वमेव रिमूव नहीं कर देते, तब तक इनकी बिना अंडरवियर वाली बातें सुनते हैं, पढ़ते हैं और आपको भी पढ़ाते हैं, सीरियस मत होना, वरना, दुनिया झूठी लगने लगेगी। वर्दी पहनकर तो यह घाघ बन जाते हैं, कुछ बोलते ही नहीं। रुको, एक ताजा भड़ास और गिरी है। देखें क्या लिखा है-

क्यों भाई, थाने का लालच क्यों पालते हो। ज्यादा से ट्रांसफर करेंगे। सस्पेंशन करेंगे। पूरी-आधी सेलरी तो मिलेगी। उसी से बच्चों को पढ़ाएंगे। संस्कार देंगे। कम से कम चोर तो नहीं बनेंगे। हमपे तो चोर का ठप्पा भी लगता ही है।

यार, हम छोटे चोरों को हर कोई भाषण पिला देता है। बड़े वाले चोरों को क्या कहें। असली सरगना तो यही हैं। ये ईमानदारी से नौकरी करने दें तो हमे क्या पड़ी है।

बिल्कुल खरी बात कही है, भाई। इन बड़े वाले चोरों को तो कोई कुछ नहीं कहता। ये बड़े वाले तो एक दूसरे को बचाते भी रहते हैं। हम छोटे वालों को तो कोई पूछता भी नहीं। लखनऊ भी इन्हीं की सुनता है। हाथरस हो या बलिया। गलती भी इन्हीं की और जांच भी इन्हीं को। सजा सिर्फ हमें मिलती है। एसआइटी और सीबीआइ से पहले एक बार दारोगा-इंस्पेक्टर से भी पूछ लो कि मामला क्या था। सीओ देवेंद्र शहीद हो गए। अब उनके एसपी से डीजीपी तक के जो आडियो वायरल हो रहे, उनका क्या? करोगे एनकाउंटर! पलटाओगे गाड़ी? अगला कितनी निराशा में गया होगा बिकरू। अगले दिन का सोचा भी न होगा।

सौ फीसद सहमत। लेकिन, माफ करना गलती हमारी भी है। कानपुर में बड़े चोरों के खिलाफ कितनों ने गवाही दी। जानते सब थे। महोबा में बड़े चोर के खिलाफ कितनों ने मुंह खोला। पता किसको नहीं था। इसीलिए कहते हैं- ये बड़े चोर आपस में एक दूसरों को बचा ले जाते हैं। बलि का बकरा हम बनते हैं। गुलामी, इस हद तक कि जुबान सीकर बैठे रहते हैं।

नजर के सामने से जितने मैसेज गुजरे आपके सामने रख दिये। टिप्पणी करने की जरूरत महसूस नहीं हो रही। और भी जो कुछ गुजरेगा, वह भी बताएंगे। फिलहाल देखते हैं कि इस भड़ासिए ग्रुप से अगली मुलाकात के पहले रिमूव न हो जाएं।

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