हमीरपुर : घर के आंगन में महिलाओं ने की गोवर्द्धन पर्वत की पूजा

हमीरपुर। जनपद में रविवार को गोवर्द्धन की पूजा की धूम मची हुयी है। घर के आंगन में महिलाओं ने गाय के गोबर से गोवर्द्धन पर्वत बनाकर विधि विधान से पूजा की। विभिन्न खाद्य पदार्थों के मिश्रण से बने अन्नकूट के प्रसाद का भोग लगाकर महिलाओं ने व्रत समाप्त किया। महिलाओं ने गाय और बछड़े की भी पूजा की। गोवर्द्धन पूजा शहर से लेकर गांवों में बड़े ही धूमधाम से कर महिलाओं ने सुख और शांति की कामना की।

दीपावली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्द्धन पूजा उत्सव यहां बड़े ही धूमधाम से मनाये जाने की परम्परा है। ऐसी मान्यता है कि द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने इस पूजा की शुरूआत करायी थी। पंडित दिनेश दुबे ने बताया कि इससे पहले गोकुल वासी समुचित वर्षा के लिये देवराज इन्द्र की पूजा किया करते थे।

श्रीकृष्ण ने गोकुल वासियों को गोवर्द्धन पर्वत की पूजा करने के लिये प्रेरित करते हुये उनके अंदर प्रकृति प्रेम की भावना का संचार किया था। जब इन्द्र ने देखा कि गोकुल के लोग उनकी पूजा कर गोवर्द्धन पर्वत की पूजा कर रहे है तो वह कुपित हो गये और मूसलाधार बारिश शुरू कर दी थी। इससे जनजीवन अस्तव्यस्त होने लगा। सभी लोग घबराकर भगवान श्रीकृष्ण के यहां पहुंचे।

श्रीकृष्ण ने देवराज इन्द्र का अभिमान चूर करने के लिये पूरे सात दिनों तक गोवर्द्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठा सम्पूर्ण गोकुल वासियों की इन्द्र के प्रकोप से रक्षा की थी। आखिर थक हार कर इन्द्र भगवान श्रीकृष्ण की शरण में पहुंचे और अपने किये पर माफी मांगी थी। तभी से यह गोवर्द्धन पूजा करने की परम्परा पड़ी जो अभी भी जारी है।

गुरुवार को जिले के नगर और कस्बों से लेकर गांवों तक घर-घर गोवर्द्धन पर्वत की पूजा अर्चना की गयी। महिलाओं ने गाय के गोबर से अपने घर के आंगन में गोवर्द्धन पर्वत बनाया और व्रत रहकर विधि विधान से पूजा अर्चना की। गोवर्द्धन पूजा को अन्नकूट पूजा भी कहा जाता है। यहां से तमाम लोग मथुरा वृन्दावन के समीप गोवर्द्धन पर्वत की परिक्रमा करने भी गये है।

गोवर्द्धन पर्वत की परिक्रमा से घर में आती है खुशहाली

जिले के ग्रामीण इलाकों में गोवर्द्धन की पूजा विशेष प्रकार से की जाती है लेकिन आज के दिन गोवर्द्धन पर्वत की परिक्रमा करने मात्र से ही घर में खुशहाली आती है। ऐसी मान्यता है कि द्वापर युग में श्री कृष्ण ने इस पूजा की शुरूआत कराई थी। कहा जाता है इससे पूर्व गोकुल वासी समुचित वर्षा के लिये देवराज इन्द्र की पूजा किया करते थे।

श्री कृष्ण ने गोकुल वासियों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिये प्रेरित करते हुए उनके अंदर प्रकृति प्रेम की भावना का संचार किया। जब इन्द्र ने देखा कि गोकुल के लोग उसकी पूजा न कर गोवर्धन पर्वत की पूजा कर रहे हैं तो इन्द्र कुपित हो गया तथा जोर दार वर्षा प्रारम्भ कर दी। भारी बारिश से जनजीवन अस्तव्यस्त होने लगा तथा सभी ने मिल कर भगवान श्री कृष्ण से गुहार लगाई।

भगवान श्री कृष्ण ने इन्द्र का अभिमान चूर करने के लिये पूरे सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठा सम्पूर्ण गोकुल वासियों की इन्द्र के प्रकोप से रक्षा की थी। आखिर थक हार कर इन्द्र भगवान की शरण में पहुंचा तथा अपने किये की माफी मांगी। तभी से यह गोवर्धन पूजा की शुरूआत हुई जो आज तक पूरी श्रद्धा के साथ की जाती है। गोवर्धन पूजा को अन्नकूट पूजा भी कहा जाता है। इस दिन अनेक लोग मथुरा ब्रन्द्रावन के समीप स्थित गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने भी जाते हैं। घर में की जाने वाली पूजा से ज्यादा महत्व गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का है।

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