नवरात्र के बारे में इन बातों को नहीं जानते होंगे आप, जानिए क्‍या है खास

नव+रात्र = इसमें दो शब्द हैं। नव का एक अर्थ है, ‘नूतन’ होता है अर्थात वासन्तिक नवरात्र से नूतन वर्ष का प्रारम्भ। नव का दूसरा अर्थ संख्यावाचक ‘नौ’ और ‘रात्र’ का अर्थ- कालविशेष रात्रिसमूह। इस प्रकार ‘नवरात्र’ शब्द में संख्या (Number) और काल (Time) का अद्भुत सम्मिश्रण है। जब वर्षा ऋतु से शरद् ऋतु की ओर अग्रसर होते हैं- इस समय ‘शारदीय नवरात्र का पर्व होता है। यह काल ‘सोम प्रधान’ चावल उत्पत्ति का समय। इसी प्रकार ब्रम्हाण्डीय ऊर्जा वसन्त में ‘अग्नि प्रधान’ तथा शरद् में ‘सोम प्रधान’ होकर सम्पूर्ण विश्व के लिए इन दोनों नवरात्रों में जीवन पोषक अग्नि एवं सोम के युगल का उपहार प्रदान करती है।

नवरात्र

‘नौ’ की संख्या अखण्ड, अविकारी रस ब्रह्रम ही है। आगम ग्रन्थों में रात्रि को ‘देवीसूचक’ अर्थों मे लिया गया है। भगवती दुर्गा के ‘नौ’ रूपों का देवी माहात्म्य में वर्णन है- शक्ति के तीन गुण होते हैं- सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण। इन तीनों को तीन से गुणा करने पर ‘नौ’ होता है, क्योंकि ये तीनों ही परस्पर आपस में सन्निविष्ट हैं- जिस प्रकार यज्ञोपवीत में तीन बड़े धागे- तीनों में प्रत्येक धागा तीन-तीन से बना है, उसी प्रकार प्रकृति गुणात्मक रूप से ‘नवविध’ है। यथा- महाकाली, महालक्ष्मी, सरस्वती। दुर्गा का स्मरण होते ही ‘लालवर्ण’ जो कि शक्ति का प्रतीक है- शरीर में उत्साह एवं उमंग का संचार हो जाता है।

दुर्गा जी के ‘नौ’ स्वरूपों की आराधना नवरात्रि में क्रमश: प्रतिदिन की जाती है- उनके नाम इस प्रकार हैं-

शैलपुत्री – उपनिषद् के अनुसार देवी के इस स्वरूप ने ही इन्द्रादि देवताओं का अभिमान खण्डित किया था।

‘ब्रम्हचारिणी’ अर्थात् तप का आचरण करने वाली।

‘चन्द्रघण्टा’ जो कि ‘वीर रस’ की मूर्ति है।

‘कुष्माण्डा’ सूर्यमण्डल के भीतर निवास करती है-कुम्हड़े की बलि अतिप्रिय है।

‘स्कन्दमाता’ स्कन्द अर्थात् कार्त्तिकेय की माता, यह प्रमाणित करता है कि माता-पिता भी योग्य, सद्गुणी सन्तान के नाम से जाने जाते हैं। कार्त्तिकेय अग्निमण्डल के देवता हैं।

‘कात्यायनी’ ऋषि ‘कात्यायन’ की भावना की पूर्णता के लिए उनकी पुत्री रूप में अवतीर्ण हुईं। गोपियों ने इसी रूप की आराधना कर श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त किया था।

‘कालरात्रि’ शुभत्व प्रदान करने के कारण इन्हें ‘शुभ्ंकरी’ भी कहते हैं।

‘महागौरी’ सुवासिनी, शान्तमूर्त्ति और शान्तमुद्रा हैं।

‘सिद्धिदात्री’ आठ प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करती हैं। इन्हीं के साथ संयुक्त होकर शिव का ‘अर्धनारीश्वर’ रूप बना।

आद्य गुरू शंकराचार्य देवी आराधना में ‘सौन्दर्यलहिरी’ के प्रथम श्लोक में लिखते हैं – “शिव: शक्या युक्तो यदि भवति शक्त: प्रभवितुं न देवं देवो न खलु कुशल: स्पन्दितु मपि” अर्थात् शक्ति के बिना शिव स्पन्दन तक करने में समर्थ नहीं हो सकते।

हर दिन के लिए है अलग रंग

नवरात्र के दौरान हर दिन का एक रंग तय किया गया है। इन रंगों के उपयोग से सौभाग्य प्राप्ति की मान्यता है।

प्रतिपदा- पीला

द्वितीया- हरा

तृतीया- भूरा

चतुर्थी- नारंगी

पंचमी- सफेद

षष्टी- लाल

सप्तमी- नीला

अष्टमी- गुलाबी

नवमी- बैंगनी

सनातन धर्म में हैं चार नवरात्र

सनातन धर्म में एक साल में चार नवरात्र आते हैं। चैत्र माह के नवरात्र को बासंतिक नवरात्र और अश्विन माह के नवरात्र को शारदीय नवरात्र कहा जाता है। आषाढ़ माह और पौष-माघ माह के नवरात्रों को गुप्त नवरात्र कहा जाता है। चार नवरात्रों में कुल 36 दिन होते हैं, इस अवधि में शारीरिक और मानसिक रूप से शुद्ध बने रहना चाहिए।

9 छिद्र :

हमारे शरीर में 9 छिद्र हैं। दो आंख, दो कान, नाक के दो छिद्र, दो गुप्तांग और एक मुंह। यदि नवरात्रों के दौरान उक्त नौ अंगों को पवित्र और शुद्ध रखा जाएगा तो मन निर्मल और छह इंद्रियां को जाग्रत होंगी। अगर कोई मनुष्य 365 दिन में से करीब दसवां हिस्सा 36 दिन उपवास रखता है तो मानसिक और शारीरिक स्वच्छता अवश्यंभावी है।

9 संयम :

नवरात्र के नौ दिनों की अवधि में कम से कम 9 तरह के संयम बरते जाने चाहिए।

आहार संयम :  मांस-भक्षण, तामसिक एवं राजसी भोजन वर्जित है। एक समय सात्विक भोजन अथवा फलाहार ही लेना चाहिए।

मद्यपान :  किसी भी प्रकार का नशा मद्यपान, सिगरेट, तम्बाकू आदि नहीं चाहिए।

सहवास : इन दिनों ब्रह्मचर्य का पालन किया जाना चाहिए ।

नकारात्मक विचार :  पूरे नौ दिनों तक मां जगदंबा की भक्ति में ही रत रहने से किसी भी प्रकार के नकारात्मक विचार नहीं चाहिए।

वाणी संयम : कुछ लोग 9 दिन मौन धारण कर लेते हैं। आज के समाज में मौन नहीं रहा जा सकता है तो कम से कम कटु वचन या गाली आदि नहीं बोला जाना चाहिए।

मानसिक संयम :  क्रोध, मद, लोभ, आसक्ति, रोना, हंसना और उद्वेगपूर्ण भाव नहीं रखना चाहिए। मन को नियंत्रण में रखा जाना चाहिए।

वर्जित साधनाएं :  इन दिनों में कुछ लोग तांत्रिक साधना या अघोर साधना करते हैं जो कि सामान्य मनुष्यों के लिए वर्जित है।

गलतियों से बचें : अगर नौ दिन तक जगदंबा मां का उपवास नहीं रख पा रहे हैं तो मानस भक्ति ही सर्वोपरि है। पूजा स्थल एवं घर और उसके आसपास गंदगी नहीं रखनी चाहिए।

स्नान: नवरात्र के दिनों में नियमित स्नान करना चाहिए। गंदे या बिना स्नान किए वस्त्र नहीं पहनना उचित नहीं।

इस पर भी ध्यान दें-

नवरात्र व्रत के दौरान दिन में नहीं सोना पूर्णतया वर्जित है। अगर संभव हो तो खाने में अनाज और नमक का सेवन नहीं करना चाहिए। सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, सेंधा नमक, फल, कुट्टू का आटा, समारी के चावल, आलू, मेवे, मूंगफली का सेवन करना उचित है। दुर्गा चालीसा, सप्तशती पाठ अथवा चण्डी पाठ पढ़ रहे हैं तो नियमों का पालन हर हाल में करें। पाठ पढ़ते समय बीच में किसी से बात न करें। कई जगह यह भी मान्यता है कि नवरात्रों में दाढ़ी, नाखून व बाल नहीं काटे जाते, इस मामले में आप अपनी परंपरा का पालन करें।

मां के शक्तिपीठों पर है अपार श्रद्धा

आमतौर पर 51 शक्तपीठ माने जाते हैं मगर सनातन धर्म के कई ग्रंथों में इनकी संख्या अलग-अलग है। शक्ति पीठों की संख्या देवी भागवत पुराण में 108, कालिका पुराण में 26, शिवचरित्र में 51, दुर्गा शप्तसती और तंत्र चूड़ामणि में 52 बताई गई है। ‘देवीपुराण’ में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है।

मान्यता है कि माता सती अपने पिता राजा दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपने पति भगवान शंकर का अपमान सहन नहीं कर पाई तो उसी यज्ञ की अग्नि में कूदकर भस्म हो गई। महादेव को जब यह पता चला तो उन्हें अत्यधिक क्रोध आ गया। उन्होंने अपने गण वीरभद्र और महाकाली को भेजकर यज्ञ उजाड़ दिया। राजा दक्ष का सिर काट दिया, भगवान विष्णु और ब्रह्माजी भी इन गणों के क्रोध का भाजन बने। शिवजी सती की जला हुआ शव लेकर विलाप करते हुए अंतरिक्ष में विचरण करने लगे। जिस-जिस स्थान पर माता सती के अंग और आभूषण गिरे वहां शक्तिपीठ बन गए।

विशालाक्षी शक्तिपीठ :

तंत्र चूड़ामणि के अनुसार काशी में मणिकर्णिक घाट पर माता के दाहिने कान के मणिजड़ित कुंडल गिरे। इसी शक्ति को विशालाक्षी मणिकर्णी और भैरव को काल भैरव कहा जाता है। काशी का स्थान देव कालीन सात पवित्र पुरियों में से एक काशी के विश्वनाथ मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित है विशालाक्षी गौरी का प्रसिद्ध मंदिर। यहीं विशालाक्षेश्वर महादेव का शिवलिंग भी है।

विशालाक्षी मंदिर का वर्णन देवीपुराण में आता है। देवी भागवत में सर्वप्रथम विशालाक्षी का उल्लेख मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार विशालाक्षी मां नौ गौरियों में पंचम हैं तथा देवाधिदेव काशी-विश्वनाथ विशालाक्षी मंदिर के समीप ही विश्राम करते हैं। विशालाक्षी माता को गंगा स्नान के बाद धूप, दीप, सुगंधित हार व आभूषण, वस्त्र आदि चढ़ाए जाएं। मां विशालाक्षी की उपासना से सौंदर्य और धन मिलता है। यहां 41 मंगलवार ‘कुमकुम’ का प्रसाद चढ़ाया जाए तो देवी मां प्रसन्न होती हैं।

Related Articles

Back to top button
E-Paper