पढ़ाई और करियर को लेकर युवा हो रहे एंजाइटी के शिकार

संवाददाता- अपर्णा शुक्ला

रपट एनएसएस व यूनिसेफ के संयुक्त अभियान ‘मुस्कुराएगा इंडिया’ में बात आई सामने, प्रदेश में 300 काउंसलर लगातार युवाओं के संपर्क में, कर रहे काउंसिलिंग

लखनऊ। हमेशा चिंता, बेचैनी, वास्तविक या काल्पनिक घटनाओं पर आधारित भविष्य का डर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। दौड़-भाग और तनाव भरी जिंदगी में लोग डिप्रेशन और एंजाइटी का शिकार हो रहे हैं। एंजाइटी में मरीज को तेज बैचेनी के साथ नकारात्मक विचार, चिंता और डर का आभास होता है। अगर आपका कोई अपना इस बिमारी का शिकार हो तो उसके साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं, क्योंकि ये एक बड़े खतरे की घंटी हैं।

बीते 10 अक्टूबर को वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे था। लॉकडाउन से युवाओं के करियर भी प्रभावित हुए हैं। समय के साथ युवाओं के दिल की धड़कन उनके भविष्य को लेकर बढ़ती जा रही है। चिंता के बढ़ते ग्राफ का यह सच ‘मुस्कुराएगा इंडिया’ अभियान की पहली रिपोर्ट में सामने आया है। खास बात है कि अपनी पढ़ाई और करियर को लेकर परेशान होने वालों की उम्र महज 19-25 साल के बीच है।

मौज-मस्ती, सपने देखने, उड़ान भरने की इस उम्र में युवाओं में करियर को लेकर बढ़ता तनाव उनके परिवार की चिंता का कारण भी बन रहा है। ‘मुस्कुराएगा इंडिया’ एनएसएस व यूनिसेफ का संयुक्त अभियान है। इसके तहत उत्तर प्रदेश में 300 काउंसलर लगातार युवाओं के संपर्क में हैं। वे न सिर्फ समस्याएं सुनते हैं बल्कि लगातार उनकी काउंसलिंग करते हैं।

छोटी बातों पर ज्यादा चिंता करना है एंजाइटी

जीवन में छोटी-छोटी बातों को लेकर ज़्यादा चिंता करना ही एंजाइटी का लक्षण होता है। उदाहरण के लिए कि पानी बरबाद होने को लेकर चिंता, रुपये चले जाने की चिंता आदि। जब कोई बहुत परेशान होता है, तो उसका सिमपेथेटिक नर्वस सिस्टम बहुत तेज़ हो जाता है और इसी कारण दिल की धड़कन बढ़ जाती है। पसीना आता है, शरीर में कंपन होता है और मुंह भी सूखने लगता है। थकान का लंबे समय तक महसूस होना भी एंजाइटी डिसऑर्डर हो सकता है। यह चिंता की वजह से भी हो सकती है। ज़्यादा चिंता करने से नींद न आने के साथ तनाव भी रहता है। इसी तरह चिड़चिड़ापन, मसल्स में तनाव का अहसास, सोने में परेशानी, लोगों से घुलने-मिलने में दिक्कत भी एंजाइटी डिसऑर्डर का ही लक्षण है ।

नशा बनाता है और बीमार

अपना दुख भुलाने के लिए बहुत लोग शराब व अन्य नशीले उत्पादों का सहारा लेते हैं, परंतु ये नशीली चीजें कभी भी एंजाइटी डिसऑर्डर से पीछा नहीं छुड़ा सकती हैं। बल्कि ये समस्या को और अधिक गंभीर बना देंगी । व्यक्ति नशे का आदि हो जाएगा और नशे का असर खत्म होते ही उनमें तलब के साथ घबराहट बढ़ने लगेगी। झलकारी बाई अस्पताल की डॉ सुधा वर्मा बताती हैं कि आमूमन देखा गया है कि नौकरी पेशा महिलाएं जिनकी नौकरी लॉकडाउन के दौरान चली गई है उनमें एंजाइटी डिसऑर्डर की दिक्कतें होती हैं। जिनको अपने करियर से अपेक्षाएं होती हैं।  

शिक्षा को लेकर ज्यादा लिया जा रहा तनाव

  • = 37 फीसदी शिक्षा की समस्या
  • = 14 फीसदी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी
  • = 12 फीसदी आर्थिक समस्या
  • = 12 फीसदी परिवार के मुद्दे
  • = 10 फीसदी शारीरिक स्वास्थ्य
  • = 7 फीसदी रोजगार
  • = 4 फीसदी भोजन से संबंधित

(‘मुस्कुराएगा इंडिया’ अभियान के तहत इन समस्याओं पर सबसे ज्यादा गए फोन)

एंजाइटी मिर्गी का रूप ले सकता है

एंजाइटी डिसऑर्डर में मरीज का अचानक हाथ कांपना, पसीने आना शुरू हो जाता है। अगर समय पर इसका सही इलाज न किया जाए तो यह बहुत खतरनाक हो सकता है और मिर्गी का कारण भी बन सकता है। आगे चलकर रोगी अपना अहित भी कर सकता है। – डॉ. पीके दलाल, मनोरोग विशेषज्ञ, केजीएमयू

एंजाइटी और डिप्रशेन में है अंतर

एंजाइटी और डिप्रशेन दोनों में ही बैचेनी और घबराहट होती है, लेकिन ये दोनों अलग-अलग बीमारी हैं। एंजाइटी में व्यक्ति भविष्य से सबंधित चीजों को लेकर डरता है। नाकारात्मक सोच के साथ जीता है। वहीं, डिप्रशेसन में व्यक्ति भावनात्मक चीजों को लेकर डरने लगता है। इसलिए ये ज्यादातर महिलाएं या युवतियां डिप्रशेसन का शिकार होती है।   – डॉ. सृष्टि श्रीवास्तव, मनोरोग विशेषज्ञ (प्रिसिंपल, नवयुग कन्या महाविद्यालय)

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