
अमेरिका में मिडटर्म चुनाव के नतीजों का असर वैश्विक बाजारों पर दिखाई देने लगा है। चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को झटका लगने और डेमोक्रेट्स की जीत के बाद कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 8 फीसदी से ज्यादा टूटकर करीब 95 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। यह पिछले दो महीनों में तेल का सबसे निचला स्तर है। दूसरी तरफ अमेरिकी और भारतीय शेयर बाजारों में जोरदार तेजी देखने को मिली।
बुधवार को कारोबार के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट के पीछे मध्य पूर्व में जारी तनाव और ईरान के साथ युद्ध को लेकर अमेरिकी रुख में संभावित बदलाव को अहम वजह माना जा रहा है।
जेडी वेंस के बयान के बाद बदला बाजार का रुख
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा था कि ईरान के साथ युद्ध की वजह से रिपब्लिकन पार्टी को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। उनके इस बयान के बाद निवेशकों ने मध्य पूर्व में संघर्ष बढ़ने की आशंकाओं का नए सिरे से आकलन किया।
वेंस ने युद्ध खत्म करने, आम लोगों की जीवन-यापन लागत पर ध्यान देने और इजरायल के साथ अमेरिका के संबंधों की समीक्षा करने की अपील की थी। बाजार ने इन बयानों को मध्य पूर्व में तनाव कम होने की संभावित उम्मीद के तौर पर देखा। माना जा रहा है कि क्षेत्र में तनाव घटने से कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर बनी चिंताएं भी कम हो सकती हैं।
अमेरिकी शेयर बाजार में भी जबरदस्त उछाल
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बीच अमेरिकी शेयर बाजार में भी तेजी देखने को मिली। बुधवार को प्रमुख अमेरिकी शेयर सूचकांक बढ़त के साथ बंद हुए।
- डाउ जोन्स: करीब 3 फीसदी की तेजी।
- एसएंडपी 500: 1.6 फीसदी की बढ़त।
- नैस्डैक कंपोजिट: 1.4 फीसदी का उछाल।
अमेरिकी बाजार में आई इस तेजी ने वैश्विक निवेशकों का भरोसा बढ़ाया और दूसरे बाजारों को भी सकारात्मक संकेत दिए।
भारतीय शेयर बाजार में सेंसेक्स 1,388 अंक उछला
अमेरिकी बाजारों की तेजी का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया। बुधवार को बीएसई सेंसेक्स 1,388.43 अंक यानी 1.8 फीसदी की बढ़त के साथ बंद हुआ। वहीं, एनएसई निफ्टी में 382.15 अंकों यानी 1.59 फीसदी का उछाल दर्ज किया गया।
कच्चा तेल सस्ता होने से भारत को क्या फायदा?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में गिरावट देश के लिए राहत की खबर हो सकती है। इससे भारत के आयात बिल पर दबाव कम होने, महंगाई को नियंत्रित रखने और चालू खाते के घाटे में राहत मिलने की संभावना रहती है।
हालांकि, पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तुरंत कमी होना जरूरी नहीं है। इसका असर अंतरराष्ट्रीय कीमतों, रुपये की विनिमय दर और घरेलू टैक्स समेत कई कारकों पर निर्भर करता है।
कुल मिलाकर अमेरिकी चुनाव के बाद बदले राजनीतिक माहौल और मध्य पूर्व में तनाव कम होने की उम्मीदों ने वैश्विक बाजारों को राहत दी है। अब निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतें किस दिशा में जाती हैं।



