गुजरात में आयोजित ‘भारत डिस्कोर्सेस ऑन वॉटर @2047’ में गूंजा यूपी का जल संरक्षण मॉडल

पर्यावरण सलाहकार डॉ. उमर सैफ और डॉ. कल्पना अरोड़ा ने पेश की कुशीनगर के जिलाधिकारी एवं वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डॉ. महेंद्र सिंह तंवर के 'ग्रीन फाइनेंस व माइक्रो-इन्वेस्टमेंट मॉडल' की केस स्टडी

कुशीनगर । गुजरात में ‘विकसित भारत 2047’ के विजन के तहत आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय जल महामंथन “भारत डिस्कोर्सेस ऑन वॉटर @2047” में उत्तर प्रदेश के अभिनव जल प्रबंधन एवं पर्यावरण संरक्षण मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। 22 और 23 अगस्त को आयोजित इस राष्ट्रीय कॉन्क्लेव का आयोजन आई-हब ( गुजरात सरकार), सेंटर फॉर वॉटर पीस ( सी डब्ल्यू पी ), डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन एवं विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ( डीएसटी , गुजरात) के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। कॉन्क्लेव के ‘ग्रीन फाइनेंस’  सत्र के दौरान जनपद के पर्यावरण सलाहकार डॉ. उमर सैफ एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. कल्पना अरोड़ा द्वारा वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ( संप्रति जिलाधिकारी , कुशीनगर ) डॉ. महेंद्र सिंह तंवर के अभिनव जल प्रबंधन एवं पर्यावरण संरक्षण मॉडल को एक सफल केस स्टडी के रूप में देश भर से आए नीति-निर्माताओं, जल विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

सबसे पहले देश के पहले ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड और 40 एमएलडी जल का सतत पुनर्चक्रण की प्रस्तुति के दौरान विशेषज्ञों ने रेखांकित किया कि गाजियाबाद नगर आयुक्त के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान डॉ. महेंद्र सिंह तंवर ने वित्तीय नवाचार का ऐतिहासिक उदाहरण पेश किया था। नगर निगम गाजियाबाद ने वेस्ट वॉटर टर्शियरी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ( टीएसटीपी ) के निर्माण के लिए ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड के माध्यम से वित्तीय संसाधन जुटाए। इस दूरदर्शी परियोजना से प्रतिदिन 40 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) शोधित पानी को साहिबाबाद औद्योगिक क्षेत्र की इंडस्ट्रीज के लिए सुरक्षित एवं सतत आपूर्ति में बदला गया। इसने न केवल भूजल के अत्यधिक दोहन पर रोक लगाई, बल्कि औद्योगिक उपयोग के लिए ‘सर्कुलर वॉटर इकोनॉमी’ की एक मजबूत मिसाल भी कायम की। डॉ. उमर सैफ और डॉ. कल्पना अरोड़ा ने बताया कि महंगे सीवेज प्रोजेक्ट्स के साथ-साथ डॉ. तंवर ने ‘ग्रीन माइक्रो-इन्वेस्टमेंट इनिशिएटिव’ की शुरुआत की। इस नवाचार के तहत वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के सहयोग से मात्र कुछ लाख रुपयों के किफायती निवेश में नालों और दूषित जल स्रोतों में इन-सीटू सोलर एरियेशन  और ओजोनेशन सिस्टम  स्थापित किए गए। इस पर्यावरण-अनुकूल वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से पानी के प्रदूषण भार  को स्रोत पर ही उपचारित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप हिंडन नदी में जाने वाले प्रदूषण लोड में लगभग पांच प्रतिशत तक की ठोस कमी दर्ज की गयी ।  केस स्टडी में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि इस मॉडल की सबसे बड़ी मजबूती इसकी प्रशासनिक निरंतरता रही। डॉ. तंवर द्वारा किए गए ठोस प्रशासनिक और प्रक्रियागत सुधारों का ही परिणाम है कि उनके स्थानांतरण के बाद आने वाले नगर आयुक्तों ने भी इन ग्रीन इनिशिएटिव्स को निरंतर जारी रखा और आगे बढ़ाया ।

गाजियाबाद में सफल प्रयोग के उपरांत, इस ‘ग्रीन माइक्रो-इन्वेस्टमेंट मॉडल’ को कुशीनगर के जिलाधिकारी  के रूप में डॉ. तंवर द्वारा ग्रामीण और अर्ध-शहरी पारिस्थितिकी तंत्र में बड़े पैमाने पर स्केल-अप  किया गया। कुशीनगर जनपद के दस महत्वपूर्ण वेटलैंड्स (आर्द्रभूमियों) और दो स्थानीय नदियों के दीर्घकालिक संरक्षण एवं पुनरुद्धार के लिए इस मॉडल को सफलतापूर्वक लागू किया गया है। स्थानीय संसाधनों और वैज्ञानिक निगरानी के समन्वय से जल संरक्षण एवं जैव विविधता का दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित हो रहा है। सत्र के समापन पर डॉ. उमर सैफ ने कहा कि “विकसित भारत @2047 के जल सुरक्षा लक्ष्य को हासिल करने के लिए बड़े पूंजीगत प्रोजेक्ट्स (ग्रीन बॉन्ड) और जमीनी स्तर पर बेहद कम लागत वाले वैज्ञानिक नवाचारों (ग्रीन माइक्रो-इन्वेस्टमेंट) का संतुलन सबसे सटीक और व्यावहारिक समाधान है।” सम्मेलन में उपस्थित जल विशेषज्ञों, प्रशासनिक अधिकारियों और शोधकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश के इस मॉडल को अन्य राज्यों के नगर निकायों और जनपदों में भी नीतिगत स्तर पर लागू करने योग्य बताया।

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