जहां से देश में शुरू हुआ विकास का सफर, आज खुद विकास की बाट जोह रहा प्रथम ब्लॉक – इटावा

ब्लॉक स्थापना दिवस पर विशेष | 15 सितंबर 1948 को महेवा से रखी गई थी देश के ग्रामीण विकास की पहली नींव

महेवा, इटावा । कभी देश के लाखों गांवों के कृषि और ग्रामीण विकास का सपना जिस छोटे से कस्बे की धरती से आकार लेने लगा था, आज वही महेवा विकास की दौड़ में खुद पीछे छूटता दिखाई दे रहा है। इतिहास के पन्नों में दर्ज महेवा देश के पहले विकासखंड के रूप में गौरवशाली पहचान रखता है। 15 सितंबर 1948 को तत्कालीन संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने यहां अग्रगामी विकास योजना का शिलान्यास और उद्घाटन एक साथ किया था।

इसी के साथ महेवा को देश ही नहीं, बल्कि एशिया महाद्वीप के पहले विकासखंड के रूप में पहचान मिली। उस दौर में यह स्थान ग्रामीण विकास की प्रयोगशाला बना था। मकसद था कि यहां तैयार होने वाला मॉडल देश के गांवों की तस्वीर बदलने में मददगार बने। लेकिन करीब आठ दशक के सफर में तस्वीर बदल गई। जिस महेवा से विकास की योजनाओं का मॉडल देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचना था, वही आज अपने बुनियादी विकास के लिए इंतजार करता नजर आता है।

जब गांवों के विकास का खाका तैयार हुआ

देश में विकासखंड व्यवस्था की नींव अचानक नहीं पड़ी थी। ब्रिटिश शासनकाल में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने सिंचाई व्यवस्था की तर्ज पर कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों के समग्र विकास की दिशा में एक योजना का खाका तैयार कराया था। इसके लिए ऐसे विशेषज्ञ की तलाश की गई, जो कृषि के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गहरी समझ रखता हो।

हालांकि इसी बीच देश में स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो गया। अगस्त क्रांति के बाद परिस्थितियां तेजी से बदलीं और अंततः 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हो गया।

महात्मा गांधी गांवों और कृषि को भारत की आत्मा तथा विकास की धुरी मानते थे। इसी सोच से प्रभावित होकर प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ग्रामीण विकास की इस अवधारणा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। इसी क्रम में संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रसिद्ध कृषि विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री डॉ. अल्बर्ट मायर को भारत बुलाया गया।

महेवा ने जीत लिया डॉ. मायर का मन

देश के कई हिस्सों का दौरा करने के बावजूद डॉ. अल्बर्ट मायर को ऐसी जगह नहीं मिली, जहां वे अपनी ग्रामीण विकास योजना को प्रयोग के तौर पर लागू कर सकें। इसी दौरान नेहरू की सलाह पर उनका रुख इटावा की ओर हुआ।

इटावा से औरैया की ओर जाते समय जब उनका वाहन महेवा पहुंचा तो यहां का वातावरण उन्हें ठहरने के लिए मजबूर कर गया। श्री ठाकुर जी मंदिर के समीप उतरकर उन्होंने महेवा का भ्रमण किया।

छोटे से कस्बे में उस समय भव्य मंदिर, फूलबाग, पशु चिकित्सालय, जन चिकित्सालय, डाकघर, व्यवस्थित बाजार और शिक्षण संस्थाएं मौजूद थीं। चारों ओर हरियाली देखकर डॉ. मायर प्रभावित हुए। उन्हें लगा कि ग्रामीण विकास की परिकल्पना को जमीन पर उतारने के लिए इससे बेहतर जगह शायद नहीं हो सकती।

उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर महेवा में योजना को लागू करने की इच्छा जताई। इसके बाद राज्य सरकार ने उन्हें आवश्यक विशेषज्ञ और संसाधन उपलब्ध कराने की व्यवस्था की।

आईसीएस स्तर के अधिकारी डॉ. ध्यानपाल सिंह और डॉ. बैजनाथ सिंह को उनके साथ लगाया गया। क्षेत्र में कृषि के जानकार माने जाने वाले दिलीपनगर निवासी पंडित आनंद माधव शुक्ल का भी सहयोग लिया गया। इसी प्रयास से महेवा में ग्रामीण विकास की उस ऐतिहासिक योजना की शुरुआत हुई, जिसने आगे चलकर देश में विकासखंड व्यवस्था का स्वरूप तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

15 सितंबर 1948: इतिहास में दर्ज हो गया महेवा का नाम

प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने 15 सितंबर 1948 को महेवा में अग्रगामी विकास योजना का शिलान्यास और उद्घाटन किया। यह दिन भारतीय ग्रामीण विकास के इतिहास में मील का पत्थर बन गया।

महेवा उस प्रयोग का केंद्र बना, जिसका उद्देश्य था—कृषि उत्पादन बढ़ाना, गांवों में आधारभूत सुविधाएं विकसित करना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और लोगों की भागीदारी से गांवों की तस्वीर बदलना।

बाद में यही अवधारणा देशभर में विकासखंड व्यवस्था के विस्तार का आधार बनी।

कचहरी से ब्लॉक भवन तक का सफर

महेवा ब्लॉक का शुरुआती सफर भी अपने आप में इतिहास समेटे हुए है।

1948 से 1950 तक ब्लॉक का कामकाज श्री ठाकुर रामचंद्र जी महाराज विराजमान मंदिर परिसर स्थित कचहरी में संचालित हुआ। वर्ष 1951 में मंदिर के समीप ब्लॉक भवन तैयार हुआ और कार्यालय वहां स्थानांतरित कर दिया गया।

इसके बाद 15 अगस्त 1982 को ब्लॉक कॉलोनी में नए भवन का निर्माण पूरा हुआ। तत्कालीन ग्राम विकास मंत्री बलराम सिंह यादव ने इसका उद्घाटन किया।

वर्ष 1957 में अग्रगामी विकास योजना को रूरल डेवलपमेंट के रूप में परिवर्तित करते हुए विकासखंड व्यवस्था का स्वरूप दिया गया। पंडित यज्ञदत्त शर्मा को महेवा का पहला खंड विकास अधिकारी नियुक्त किया गया।

वर्ष 1961 में क्षेत्र समिति का गठन हुआ और वर्ष 1962 में हुए ब्लॉक प्रमुख के चुनाव में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नगला शुक्ल निवासी पंडित हरिश्चंद्र शुक्ला को पहला ब्लॉक प्रमुख बनने का गौरव प्राप्त हुआ।

गौरवशाली इतिहास और वर्तमान की बदहाल तस्वीर

महेवा का इतिहास जितना गौरवशाली है, वर्तमान की तस्वीर उतनी ही सवाल खड़े करती है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक ब्लॉक की पुरानी आवासीय कॉलोनी के कई क्वार्टर जर्जर हालत में हैं और कुछ पर अवैध कब्जे की शिकायतें भी हैं। ऐसे में किसी अप्रिय घटना की स्थिति में बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है।

कस्बे में अतिक्रमण, जर्जर सड़कें और गंदगी की समस्या भी लोगों को परेशान कर रही है। मुगल रोड पर जलभराव की समस्या बरसात में और गंभीर हो जाती है। जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली को लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी है।

महेवा का पशु चिकित्सालय भी बदहाली से जूझ रहा है। स्थानीय स्तर पर इस भूमि पर भूमाफियाओं की नजर होने की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं।

विडंबना यह है कि जिस स्थान से ग्रामीण विकास की योजनाओं का सफर शुरू हुआ, वहां आज भी थाना, तहसील और नगर पंचायत जैसी मूलभूत प्रशासनिक सुविधाओं की मांग पूरी नहीं हो सकी है।

थाने की कवायद से जगी उम्मीद

महेवा में थाना स्थापित किए जाने की मांग लंबे समय से उठती रही है। बताया जाता है कि जनपद के तत्कालीन एसएसपी संजय कुमार वर्मा के कार्यकाल में इसके लिए कवायद शुरू हुई थी।

अब वर्तमान पुलिस अधीक्षक बृजेश कुमार श्रीवास्तव की ओर से भी इस संबंध में अपनी आख्या शासन को भेजे जाने की बात सामने आई है। ऐसे में स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि महेवा को पुलिस व्यवस्था के लिहाज से भी मजबूत किया जा सकेगा।

सबसे बड़ी विडंबना—दूसरों को विकास सिखाने वाला महेवा खुद पीछे

महेवा की कहानी अपने आप में एक बड़ा विरोधाभास है।

कभी यहां से ग्रामीण विकास का मॉडल तैयार कर देश के गांवों तक पहुंचाने की कल्पना की गई थी। लेकिन आज स्थानीय लोग सड़क, जलभराव, सफाई, अतिक्रमण, जर्जर भवन और प्रशासनिक सुविधाओं जैसी समस्याओं के समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

कभी देश के सात लाख गांवों के कृषि और ग्रामीण विकास की दिशा तय करने वाला महेवा आज अपने ही विकास की राह देख रहा है।

इतिहास के पन्नों में महेवा का नाम भले ही स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो, लेकिन जमीन पर मौजूद समस्याएं यह सवाल जरूर खड़ा करती हैं कि क्या देश के पहले विकासखंड को उसकी ऐतिहासिक पहचान और विरासत के अनुरूप विकसित नहीं किया जाना चाहिए?

नजर में महेवा

महेवा ब्लॉक देश की ऐतिहासिक धरोहर है, जो सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रहा है। बसपा सरकार में इसके कायाकल्प के लिए कई प्रयास किए थे तथा विधान परिषद में भी कई बार इसकी उपेक्षा का मुद्दा मैंने उठाया था। सरकार को इस पर ध्यान देकर जो भी समस्याएं हों, उन पर तेजी से काम करते हुए उनका निस्तारण करना चाहिए।

भीमराव अंबेडकर, बसपा नेता, पूर्व विधायक एवं पूर्व एमएलसी 

संजय सिंह, मुख्य विकास अधिकारी, इटावा कहते हैं कि इटावा में तैनाती उनके लिए सौभाग्य की बात है, क्योंकि इसी जनपद में देश का पहला विकासखंड मुख्यालय स्थित है। उनका कहना है कि महेवा से संबंधित समस्याओं की जानकारी जुटाकर उनके हरसंभव समाधान का प्रयास किया जाएगा।

वहीं बृज बिहारी त्रिपाठी, खंड विकास अधिकारी, महेवा का कहना है कि स्वतंत्र भारत के पहले ब्लॉक में कार्य करना सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए गौरव की बात है। शासन की मंशा के अनुरूप विकास कार्यों को शत-प्रतिशत धरातल पर उतारने के लिए ब्लॉक स्तर से लगातार कार्रवाई की जाती है।

इतिहास बचाने की जरूरत, सिर्फ इमारत बचाने की नहीं

महेवा केवल एक विकासखंड नहीं है। यह उस सोच की जन्मस्थली है, जिसमें गांवों को भारत के विकास की पहली इकाई माना गया था। यहां की मिट्टी ने उस प्रयोग को देखा, जिसने आगे चलकर देश की ग्रामीण प्रशासनिक व्यवस्था को नया स्वरूप दिया।

आज जरूरत केवल जर्जर भवनों की मरम्मत कराने या सड़कों को ठीक कराने की नहीं है। जरूरत है कि महेवा की ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करते हुए इसे ग्रामीण विकास के एक आधुनिक मॉडल के रूप में फिर से विकसित किया जाए।

अगर देश के पहले विकासखंड को उसकी पहचान के अनुरूप संवारा जाए तो महेवा एक बार फिर मिसाल बन सकता है—

इस बार केवल इतिहास में नहीं, बल्कि वर्तमान के विकास मॉडल के रूप में।

महेवा की कहानी का सार यही है—

जिस धरती से देश के गांवों के विकास का सपना शुरू हुआ था, अब उसी धरती को अपने विकास की नई कहानी लिखने का इंतजार है।

 

रिपोर्ट : विनोद पोरवाल महेवा

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