
ओबीसी आरक्षण के तहत क्रीमी लेयर तय करने के नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने केंद्र की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें 11 मार्च 2026 के फैसले को लागू करने के लिए दो साल का अतिरिक्त समय मांगा गया था। इसके साथ ही केंद्र ने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2025 और 2026 के अभ्यर्थियों को इस फैसले से छूट देने की मांग भी की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि ओबीसी क्रीमी लेयर का निर्धारण सिर्फ माता-पिता की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए उनकी नौकरी में स्थिति, पद और सामाजिक हैसियत को भी ध्यान में रखना जरूरी है। अदालत के इस रुख से ओबीसी आरक्षण के तहत क्रीमी लेयर तय करने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव का रास्ता साफ हुआ है।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से क्या मांगी थी राहत?
केंद्र सरकार ने अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर 11 मार्च के फैसले को लागू करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा था। सरकार का कहना था कि नए नियमों को तुरंत लागू करने से कई प्रशासनिक और कानूनी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
केंद्र ने अपनी दलील में कहा था कि यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2025 के सफल उम्मीदवारों को सेवाओं और कैडर का आवंटन करने के साथ उनकी ट्रेनिंग की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा 2016 से 2025 के बीच केंद्र सरकार, रेलवे, बैंकों, अर्धसैनिक बलों और विश्वविद्यालयों में करीब 3.70 लाख ओबीसी नियुक्तियां हुई हैं।
सरकार के मुताबिक, अगर नए फैसले को पिछली तारीख से लागू किया गया तो पुरानी नियुक्तियों, वरिष्ठता और सेवा आवंटन को लेकर बड़ी संख्या में विवाद और मुकदमे सामने आ सकते हैं।
केंद्र ने यह भी कहा था कि राज्यों और विभिन्न सरकारी संस्थानों से बातचीत करने के अलावा निजी क्षेत्र के पदों की सरकारी पदों से तुलना करने में समय लगेगा। इन सभी प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए सरकार ने करीब दो साल की मोहलत मांगी थी।
2004 के सरकारी आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों उठाए सवाल?
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के 14 अक्टूबर 2004 के स्पष्टीकरण पर भी विचार किया था। यह आदेश 8 सितंबर 1993 के मूल कार्यालय ज्ञापन से जुड़ा था। अदालत ने माना था कि PSU, बैंकों और निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों को क्रीमी लेयर में रखने या उससे बाहर करने का फैसला केवल वेतन के आधार पर नहीं किया जा सकता।
अदालत के अनुसार, सरकारी कर्मचारियों और सार्वजनिक उपक्रमों या निजी क्षेत्र में समान स्तर के पदों पर कार्यरत लोगों के बच्चों के लिए अलग-अलग मानदंड अपनाना उचित नहीं है। ऐसा व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 में दिए गए समानता के सिद्धांतों से जुड़ा सवाल खड़ा करता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का UPSC अभ्यर्थियों पर क्या होगा असर?
6 नवंबर 2026 को आए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अतिरिक्त समय देने से इनकार कर दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 11 मार्च के फैसले को सभी पुराने मामलों पर स्वतः पिछली तारीख से लागू नहीं माना जाएगा।
हालांकि, यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2025 के उम्मीदवारों का सेवा आवंटन 11 मार्च के फैसले में तय किए गए सिद्धांतों के अनुसार किया जाएगा। इससे क्रीमी लेयर की पात्रता निर्धारित करते समय केवल माता-पिता की आमदनी नहीं, बल्कि उनके पद और सामाजिक स्थिति जैसे पहलुओं पर भी विचार करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ओबीसी आरक्षण में समानता के आधार पर क्रीमी लेयर निर्धारित करने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है।



