
जम्मू को हमेशा सौतेला व्यवहार मिला है। जो कुछ भी मिला — विकास, फंड, राजनीतिक ताकत, पर्यटन का फायदा — ज़्यादातर कश्मीर घाटी को ही मिला। जम्मू हमेशा उपेक्षित रहा।
असली समस्या क्या है:
जनसंख्या और अधिकार: जम्मू क्षेत्र की आबादी कश्मीर से कम नहीं है, लेकिन विधानसभा सीटों, मंत्रालयों और नीति-निर्माण में कश्मीर को हमेशा dominance दिया गया।
फंड और विकास: कश्मीर को “विशेष दर्जा” के नाम पर अरबों रुपये बरसाए गए। जम्मू को मात्र crumbs (टुकड़े) मिले। सड़कें, यूनिवर्सिटी, इंडस्ट्री — हर जगह भेदभाव साफ दिखा।
बाँटो और राज करो: सबसे खतरनाक बात यही है जो आपने कही — भाषा, पहाड़ी बनाम मैदानी, डोगरा बनाम कश्मीरी के नाम पर लोगों को लड़ाया जाता रहा। यह पुरानी रणनीति है। जम्मू के अंदर भी (जम्मू-सांबा-कठुआ बनाम डोडा-रामबन-किश्तवाड़) और पूरे जम्मू बनाम कश्मीर में लोगों को बाँटकर रखा जाता है ताकि एकजुट आवाज़ न बन सके।
डोगरी भाषा को भी बहुत देर से आधिकारिक मान्यता मिली। पहाड़ी और गोजरी बोलने वालों को अलग-अलग लड़ाकर रखा जाता है।
2019 के बाद स्थिति:
J&K का बँटवारा (2019) और लद्दाख को अलग करने के बाद जम्मू को कुछ ज्यादा ध्यान मिल रहा है — नई परियोजनाएँ, कनेक्टिविटी आदि। लेकिन अभी भी पूर्ण समानता और न्याय की लड़ाई बाकी है। कई पार्टियाँ अभी भी कश्मीर-केंद्रित सोच रखती हैं क्योंकि वोट बैंक वहाँ集中 है।
सच्चा समाधान क्या है:
पूरे जम्मू क्षेत्र (सभी जिलों सहित) को अपना मजबूत राजनीतिक और आर्थिक स्वरूप बनाना होगा, बिना कश्मीर के खिलाफ नफरत फैलाए।
विकास, नौकरियाँ, शिक्षा, उद्योग — इन मुद्दों पर लड़ना चाहिए, सिर्फ identity पर नहीं।
“पहाड़ बनाम मैदानी” या “भाषा” के नाम पर अपने ही लोगों को बाँटने की चाल में न फँसें। यही सबसे बड़ा जाल है जो दशकों से चल रहा है।
जम्मू की असली ताकत उसकी विविधता, डोगरा इतिहास, मंदिरों, संस्कृति और सीमा क्षेत्रों की resilience में है। इसे पहचानना चाहिए, सिर्फ victimhood पर टिके नहीं रहना चाहिए।



