जेन-जी का संसद मार्च : सिर्फ ट्रेलर, पिक्चर अभी बाकी है

आशीष वाजेपयी|

दिल्ली में जेन जी का संसद मार्च भले कोई तात्कालिक प्रभाव न छोड़ पाया हो लेकिन इस स्वत: स्फूर्त आक्रोश ने जिस तरह सोमवार को दिल्ली की सड़कों पर दृश्य उपस्थित किया वह इस बात की सीधी चेतावनी है कि यदि केंद्र सरकार लचीला रुख नहीं अपनाती तो श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल की नजीर कभी भी अप्रिय स्थिति पैदा कर सकती है। चाहे जेपी आंदोलन रहा हो या इंडिया अगेंस्ट करप्शन का आंदोलन इनका नेतृत्व हमेशा युवाओं के हाथ ही रहा है और इनसे सरकारें बदली हैं। इसके पीछे हमेशा सत्तारूढ़ दलों की हेठी ही रही है।

यह अब प्रत्यक्ष दिखने लगा है कि काकरोच जनता पार्टी के रूप में एक मजाक से शुरू हुआ छात्रों-युवाओं का हल्का-फुल्का आंदोलन एक वृहद आक्रोश का रूप ले चुका है। मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी से प्रेरित यह मीम-आधारित आंदोलन जल्दी ही लाखों युवाओं को जोड़ने वाला प्लेटफार्म बन गया। अभिजीत दिपके जैसे युवा नेतृत्व में यह आनलाइन से आफलाइन तक पहुंचा। आम आदमी पार्टी और वामपंथी संगठनों ने खुलकर इसका सहारा लेने की कोशिश की, जिससे यह स्पष्ट होता है कि स्वतःस्फूर्त दिखने वाले आंदोलन के पीछे कुछ राजनीतिक ताकतें भी सक्रिय हैं। शेष विपक्ष के दूरी बनाए रखने से यह भी साफ है कि यह आंदोलन दिशाहीन होकर स्वयं दम तोड़ सकता है, लेकिन इसने युवा आंदोलन की एक नई प्रवृत्ति जरूर पैदा कर दी है।

इतिहास गवाह है कि भारत में बड़े बदलाव युवा-प्रधान आंदोलनों से ही आए हैं। जेपी आंदोलन (1974-75) और इंडिया अगेंस्ट करप्शन (2011) इसके जीवंत उदाहरण हैं। दोनों में नेतृत्व मुख्य रूप से युवाओं और छात्रों के हाथ में रहा, और दोनों ने सत्तारूढ़ दलों की घमंडी और उदासीन नीतियों को चुनौती दी। सत्ता की हेठी और जन-समस्याओं की अनदेखी ने ही इन आंदोलनों को बल दिया।

1970 के दशक की शुरुआत में भारत आर्थिक संकट, महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से जूझ रहा था। बिहार में छात्रों ने नव निर्माण आंदोलन की तर्ज पर विरोध शुरू किया। मार्च 1974 में पटना में विधानसभा घेराव के दौरान पुलिस फायरिंग में छात्र मारे गए। यहीं जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने नेतृत्व संभाला। पांच जून 1074 को पटना के गांधी मैदान में लाखों लोगों की उपस्थिति में जेपी ने सम्पूर्ण क्रांति का नारा दिया। यह सिर्फ सरकार बदलने की मांग नहीं थी, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और आध्यात्मिक स्तर पर पूर्ण परिवर्तन की पुकार थी। आंदोलन बिहार से गुजरात तक फैला। छात्रों, युवाओं, शिक्षकों और आम लोगों ने हिस्सा लिया। इंदिरा गांधी सरकार ने दमन किया, लेकिन आंदोलन रुका नहीं। 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले ने इंदिरा गांधी की चुनावी जीत रद कर दी। जेपी ने इस्तीफे की मांग की। परिणामस्वरूप आपातकाल लगा, लेकिन 1977 में जनता पार्टी की जीत हुई। देश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। जेपी आंदोलन ने साबित किया कि युवा आक्रोश सत्ता के घमंड को तोड़ सकता है।

2011 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के कार्यकाल में 2-जी घोटाला, कामनवेल्थ गेम्स घोटाले के आरोपों ने जनता का धैर्य तोड़ दिया। अन्ना हजारे ने जन लोकपाल बिल की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। पांच अप्रैल 2011 को जंतर मंतर पर अनशन से यह आंदोलन राष्ट्रव्यापी बन गया। अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण जैसे साथी युवा और मध्यम वर्ग को सड़कों पर लाए। लाखों लोग जुटे, सोशल मीडिया ने भूमिका निभाई। सरकार झुकी, संयुक्त ड्राफ्टिंग समिति बनी, लेकिन बिल पर टकराव जारी रहा। अगस्त 2011 में रामलीला मैदान पर अनशन ने सरकार को फिर झुकने पर मजबूर किया। संसद ने ‘सेंस आफ द हाउस’ प्रस्ताव पास किया। इस आंदोलन ने आम आदमी पार्टी को जन्म दिया, जो दिल्ली की सत्ता तक पहुंची। भ्रष्टाचार के खिलाफ युवाओं और मध्यम वर्ग का गुस्सा स्पष्ट था।

वर्तमान जेन-जी आंदोलन इन्हीं पैटर्न को दोहरा रहा है। परीक्षा पेपर लीक, बेरोजगारी, महंगाई और युवाओं को अपमानित करने की मानसिकता ने आग भड़काई। सोशल मीडिया पर शुरू होकर यह दिल्ली के संसद मार्च तक पहुंचा। पुलिस बैरिकेडिंग, इंटरनेट बंदी और लाठीचार्ज के बावजूद हजारों युवा सड़कों पर उतरे। इतिहास बताता है कि ऐसे स्वतःस्फूर्त आंदोलन अक्सर अप्रत्याशित परिणाम लाते हैं। जेपी आंदोलन शुरू में छात्र मुद्दों से शुरू हुआ था, फिर सम्पूर्ण क्रांति बन गया। इंडिया अगेंस्ट करप्शन भ्रष्टाचार के खिलाफ था, लेकिन राजनीतिक विकल्प तैयार कर गया। आज जेन-जी का आक्रोश भी सिर्फ शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं लगता। यह व्यवस्था की नाकामी, युवाओं की उपेक्षा और सत्ता के घमंड के खिलाफ है।

सरकार यदि इंदिरा गांधी या मनमोहन सिंह सरकारों की गलती दोहराती है तो स्थिति बिगड़ सकती है। युवा आज शिक्षित, सोशल मीडिया से जुड़े और असहिष्णु हैं। श्रीलंका में आर्थिक संकट ने युवाओं को सड़कों पर उतारा, बांग्लादेश में छात्र आंदोलन ने सरकार बदल दी। इसलिए मानना चाहिए कि जेन-जी का संसद मार्च सिर्फ ट्रेलर है। पूरी पिक्चर अभी बाकी है। यदि केंद्र सरकार युवाओं की आवाज सुनती है, बेरोजगारी घटाती है, शिक्षा व्यवस्था सुधारती है और घमंड छोड़ती है, तो स्थिति संभल सकती है। अन्यथा, जेपी और अन्ना आंदोलनों की तरह यह भी बड़े बदलाव का कारण बन सकता है।

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