बीएचयू में सातवें बाल चिकित्सा डायलिसिस एवं चिकित्सीय एफेरेसिस मॉड्यूल का शुभारंभ

देशभर के बाल रोग विशेषज्ञों को मिलेगा प्रशिक्षण, बच्चों में गुर्दे की आपात स्थिति के समयबद्ध प्रबंधन पर जोर

वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान (आईएमएस-बीएचयू) के बाल रोग विभाग की ओर से शनिवार को सर सुंदरलाल अस्पताल के डॉक्टर्स लाउंज में 7वें बाल चिकित्सा डायलिसिस एवं चिकित्सीय एफेरेसिस मॉड्यूल फॉर इमरजेंसी (PD-TAME) का शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम में देशभर से बाल रोग विशेषज्ञ, बाल नेफ्रोलॉजिस्ट और क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ शामिल हुए।

आधारशिला रीनल केयर प्रोजेक्ट और रूरल इंडिया सपोर्टिंग ट्रस्ट (RIST) के सहयोग से संचालित यह देशव्यापी क्षमता निर्माण कार्यक्रम बच्चों में गुर्दे से जुड़ी आपात स्थितियों की पहचान और शुरुआती स्तर पर प्रभावी उपचार के लिए चिकित्सकों का नेटवर्क तैयार करने पर केंद्रित है। प्रशिक्षण में बाल चिकित्सा डायलिसिस, चिकित्सीय एफेरेसिस और एक्यूट किडनी इंजरी के प्रबंधन से संबंधित व्यावहारिक प्रशिक्षण, मानकीकृत प्रोटोकॉल और केस आधारित शिक्षण शामिल है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने भारत में बाल नेफ्रोलॉजिस्ट की कमी को दूर करने और चिकित्सा केंद्रों में ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षित चिकित्सकों और बुनियादी डायलिसिस सुविधाओं की उपलब्धता से कई गंभीर मरीजों को समय पर उपचार मिल सकता है और उन्हें उच्च चिकित्सा केंद्रों तक ले जाने की आवश्यकता कम हो सकती है। उन्होंने चिकित्सा सेवा में संवेदनशीलता और सहानुभूति को महत्वपूर्ण बताते हुए तनावपूर्ण परिस्थितियों में स्वास्थ्यकर्मियों से संयम बनाए रखने का आह्वान किया।

आईएमएस के निदेशक प्रो. एस.एन. संखवार ने कहा कि विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से बाल नेफ्रोलॉजी के क्षेत्र में प्रशिक्षित विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाने में मदद मिलेगी। उन्होंने कार्यशाला को चिकित्सकों के ज्ञान और व्यावहारिक कौशल को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण बताया।

सर सुंदरलाल अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक प्रो. पुनीत ने बच्चों में गुर्दे की चोट जैसी गंभीर स्थितियों के प्रबंधन के लिए चिकित्सकों के उचित प्रशिक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने पेरिटोनियल डायलिसिस और हीमोडायलिसिस के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे व्यावहारिक प्रशिक्षण से स्वास्थ्यकर्मियों के कौशल में वृद्धि होगी और मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।

कार्यक्रम का नेतृत्व प्रो. ओ.पी. मिश्रा, एमेरिटस प्रोफेसर, बाल रोग विभाग, हेरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, वाराणसी एवं वरिष्ठ बाल नेफ्रोलॉजिस्ट कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सभी स्नातकोत्तर बाल रोग विशेषज्ञों को हीमोडायलिसिस और चिकित्सीय एफेरेसिस की मूलभूत जानकारी होनी चाहिए, क्योंकि गंभीर रूप से बीमार बच्चों के उपचार में ये महत्वपूर्ण जीवनरक्षक कौशल हैं।

पीडी-टेमे के कोर्स निदेशक एवं लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के बाल नेफ्रोलॉजी प्रभाग के निदेशक प्रो. अभिजीत साहा ने पेरिटोनियल डायलिसिस और हीमोडायलिसिस में अधिक से अधिक बाल रोग विशेषज्ञों को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि प्रथम स्तर के चिकित्सा केंद्रों पर यह क्षमता विकसित होने से बच्चों में गुर्दे संबंधी विकारों का समय पर उपचार संभव होगा और महानगरों के उच्च चिकित्सा केंद्रों में रेफरल की जरूरत कम की जा सकेगी।

आधारशिला रीनल केयर प्रोजेक्ट की ट्रस्टी नीना जॉली ने कहा कि बाल नेफ्रोलॉजी में शुरुआती स्तर पर छूटने वाली समस्या आगे चलकर जटिल रूप ले सकती है। उन्होंने प्रथम स्तर पर मरीज को देखने वाले स्वास्थ्यकर्मी को महत्वपूर्ण कड़ी बताते हुए चेतावनी संकेतों की पहचान, उचित उपचार और सही चिकित्सा केंद्र तक मरीज को पहुंचाने के लिए उनकी क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया।

कार्यशाला में एक्यूट पेरिटोनियल डायलिसिस, हीमोडायलिसिस, हीमोडायफिल्ट्रेशन, चिकित्सीय एफेरेसिस, ऑटोमेटेड पेरिटोनियल डायलिसिस, प्वाइंट ऑफ केयर अल्ट्रासोनोग्राफी और वैस्कुलर एक्सेस से संबंधित सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा।

कार्यक्रम में बाल रोग विभागाध्यक्ष प्रो. अंकुर सिंह ने अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया, जबकि आयोजन सचिव प्रो. अभिषेक अभिनव, नेफ्रोलॉजी प्रभाग, बाल रोग विभाग ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

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