रामलला हम आएंगे, कानून से मंदिर बनाएंगे

अशोक पाण्डेय

कोटि-कोटि ब्रह्मांड के नायक और नियामक भगवान राम को अपने ऊपर एक अदद छत के लिए अब नीति और नियमों का इंतजार करना पड़ेगा। युग बदलते हैं। समय बदलता है। समाज बदलता है। सरकारें बदलती है । नीति-नियम और कानून भी बदलते हैं। राजनीति में समय के साथ-साथ सूत्रधार और नारे भी बदलते हैं।पिछले तीस साल पहले नारा लगा था-‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे।’ इस नारे को उछालने में कारसेवक ही प्रमुख रहे हों, ऐसा भी नहीं था। भाजपा और संघ के लोग भी इस नारे को लगाने में समान सहभागी थे। समय बदला, सरकारें बदलीं और सूत्रधार बदले तो जुमले भी बदल गए। 

शनिवार को लखनऊ में भाजपा का घोषणा पत्र जारी करते हुए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनीं तो संवैधानिक तरीके से राम मंदिर बनाएंगे। प्रदेश में भाजपा की नई सरकार भी संवैधानिक तरीकों से जल्द से जल्द राम मंदिर बनवाने के लिए प्रयत्नशील रहेगी। उत्तर प्रदेश में भाजपा के वनवास की वजह भी भगवान राम से मुंह फेर लेना ही रहा है। मानसकार गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि ‘राम विमुख संपति प्रभुताई। जाई रही पाई बिनु पाई।’पौराणिक उदाहरण सामने हैं, जिस किसी ने भी भगवान राम का विरोध किया, उन्हें दुर्गति का सामना करना पड़ा। 

 देवराज इंद्र के बेटे को अपनी जान बचाने के लिए अपनी एक आंख से हाथ धोना पड़ा। उसे त्रैलोक्य भर में एक भी सहयोगी नहीं मिला। ‘ राखि को सकहिं राम कर द्रोही।’ इसके विपरीत राम कार्य के लिए जा रहे हनुमान के लिए विपरीत परिस्थितियां भी सहायक बन गई। ‘ गरल सुधा रिपु करय मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई। ’ जहर अमृत बन गया। समुद्र गाय के खुर जैसा हो गया। अग्नि शीतल हो गई। शत्रु भी मित्र हो गया। वहीं राम से विरोध की सजा रावण को भी भुगतनी पड़ी। पूरा परिवार समाप्त हो गया। ‘ इक लख पूत, सवा लख नाती। ता रावन घर दिया न बाती।’

राम से विमुख होने पर कुछ भी शेष नहीं बचता। यह बात देर से ही सही, अब भाजपा को समझ आ गई है। भाजपा अगर इस मुकाम पर पहुंची है तो इसके लिए कहीं न कहीं भगवान राम का सहयोग भी रहा है, लेकिन सत्ता में आते ही उसने भगवान राम से किनारा कर लिया। सिर्फ चुनाव दर चुनाव ही वह राम लला की बात करती रही। इसके बाद तो उसने भगवान राम का नाम लेना तक मुनासिब ही नहीं समझा। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में वह राजनीतिक वनवास झेल रही है।

राम लला तीन दशक से कारसेवकों का इंतजार कर रहे हैं। उन भाजपा नेताओं का इंतजार कर रहे हैं जिन्होंने राम लला को विश्वास दिलाया था कि रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे।’ लेकिन वे आए नहीं। राम लला को वह बातें याद आ रही हैं जो कभी लक्ष्मण को शक्ति लगने के बाद सुग्रीव और जामवंत से कही थी। उन्होंने कहा था कि ‘ संसार कहेगा बनरों ने वन में बकाए रघुवंशी।वनरे तो वन को भाग गए सब कुछ खो आए रघुवंशी।’ रामलला विवादित भवन में ही सही, रह तो रहे ही थे। उनके सिर पर छत तो थी लेकिन कारसेवकों की भक्ति पर भरोसा कर उन्होंने बहुत बड़ी भूल की।

उन्होंने उनकी बात मान ली और आज खुले आसमान के नीचे हैं। जिस तंबू-कनात में उनका अस्थायी आशियाना है, अगर उसमें भी बदलाव कराना होता है, उसके लिए भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की दरकार होती है। जिस राम की आज्ञा से ब्रह्मांड की सारी व्यवस्थाएं नियंत्रित होती हंै, वही राम नीति और नियम से, भारत के कानून से नियंत्रित हो रहे हैं। ‘यस्याज्ञयावायवोवान्ति लोके ज्वलत्यग्नि सविता यातु तप्यन। शीतांशु खे तारका संग्रहश्च प्रवर्तन्ते निशिदिनं प्रपद्ये। यस्य श्वासात सर्व धारति धऱित्री।

देवो वर्षति अंबुकालः प्रमाता। मेरुमध्ये भुवनानां च ईश तमीशानं विश्वरूपं नमामि।’ जिसकी आज्ञा से वायु बहती है। अग्नि जलती है। सूर्य तपता है। चंद्रमा और तारामंडल आसमान में चमकते हैं। जिसकी श्वास से धरती पूरी दुनिया को धारण करती है। बादल बरसते हैं।। भगवान श्रीराम जो पूरी दुनिया को नचाते हैं। ‘उमा कीट मर्कट की नाई, सबहिं नचावत राम गोसाईं।’ उसी राम को इस देश के नेता नचा रहे हैं। वे एक अदद छत के लिए तरस रहे हैं। कोर्ट के आदेश का इंतजार कर रहे हैं।

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