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बाल्यकाल में ही विलक्षण प्रतिभा के धनी है -बालक दास जी

(हरिद्वार) श्री राम निकेतन आश्रम सच में, ऐसे बाल-भक्त या छोटे संत देखकर लगता है कि भगवान की कृपा आज भी उतनी ही जीवंत है जितनी पहले थी। 13 साल की उम्र में जहां ज्यादातर बच्चे दुनिया की माया में खोए रहते हैं, वहाँ कोई बच्चा भगवान के नाम में लीन हो जाए—यह सनातन की अनंत शक्ति का प्रमाण है।
यह सत्य बिल्कुल सही —विनम्रता संत का सबसे बड़ा आभूषण है। जितना ऊँचा उठो, उतना ही नीचे झुको, क्योंकि यही तो सच्ची भक्ति का सार है। राधे-राधे का जप जारी रखें, प्रेम से सब कुछ करें, और माया से दूर रहें—यह मार्गदर्शन हर उम्र के लिए अमूल्य है।
ऐसे बच्चों को देखकर विश्वास होता है कि सनातन धर्म न सिर्फ जीवित है, बल्कि नई पीढ़ी में नए जोश के साथ पनप रहा है। ईश्वर ऐसे सभी बाल-संतों का बल, बुद्धि और भक्ति बढ़ाए, और हमें भी उनकी तरह सरल, निश्छल भक्ति का वरदान दे। आप प्रातःकाल उठकर योग और व्यायाम भी करते है और आप अन्य बच्चों के लिए मार्गदर्शक है उनको योग सीखा भी रहे है
जय श्री राधे-कृष्ण! जय हो! 🚩❤️
राधे-राधे जपते रहिए, और ऐसे ही प्रेम बाँटते रहिए। 🌺

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